दीपक का दैदीप्यमान होकर चारों दिशाओं में प्रकाश का संचरण करना दीपक,तेल,बाती और अग्नि के परस्पर सम्मिलन व सहयोग का परिणाम होता है।
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” सकारात्मक चिंतन “
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आत्म अवलोकनार्थ।
सम्मानीय आत्मजन,
शुभ दिवस।
” दीपक का मर्म “
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दीपक का दैदीप्यमान होकर चारों दिशाओं में प्रकाश का संचरण करना दीपक,तेल,बाती और अग्नि के परस्पर सम्मिलन व सहयोग का परिणाम होता है।
दीपक प्रज्वलन की सामान्य परिघटना में मनुष्य संरचना का मर्म समाहित होना प्रतीत होता है।
मनुष्य शरीर दीपक की भांति है।इस दीपक को भोजन (तेल/ईधन) की सहायता से प्रज्वलित करते है। दीपक (शरीर) स्वस्थ होकर भोज्य पदार्थो से सक्रिय (प्रकाशवान) होने के लिए हवा व बाह्य अग्नि (आत्मा/आत्म प्रकाश) की आवश्यकता भी होती है। दीपक को प्रज्वलित करने के लिए माचिस की तिली (आत्मा) की आवश्यकता होती है।
मनुष्य शरीर के समस्त अंग स्वस्थ होकर भोजन,पानी व हवा की उपस्थिति में आत्म प्रकाश से ही मनुष्य शरीर सक्रिय,सजीव व संचालित होता है।इन घटकों मे से किसी एक घटक के अभाव में मनुष्य जीवन काल कवलित होने की स्थिति में होता है।
अवचेतन “भारती “
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Regards:Iqbal Khan Gauri,Retired District Judge,M.P .
Now:Law adviser and Human duties Activist,Ujjain.
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