_भाजपा नगर अध्यक्ष के लिए आज रायशुमारी, जिलाध्यक्ष के लिए कल होगी वन टू वन चर्चा इंदौर
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_’कमलदल’ का नया सरदार हो_
*खाँटी भाजपाई, ख़ालिस इन्दौरी*
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इंदौर ।दीनदयाल भवन पर दोपहर 3 बजे से शुरू होगी इंदौर भाजपा के एक एक नेता से बातचीत_
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_सांसद, विधायक, मेयर सहित 88 नेताओ-कार्यकर्ताओं की राय से तय होगा भाजपा का नया नगर अध्यक्ष_*
————————————– इंदौर भाजपा की मंशा, शहर में ही हो जाये फैसला, भोपाल से नाम तय करने की न आये नोबत_
————————————- *_रायशुमारी के नाम पर इंदौर के साथ छल, कपट व षड़यंत्र अरसे से हो रहा हैं। रायशुमारी में सबसे ज्यादा वोट स्व विष्णुप्रसाद शुक्ला यानी बड़े भैया को मिले लेक़िन टिकट मिला उस वक्त घर पर आराम फरमा रहे नेता को। क्लेश हुआ जो अंत तक बना रहा। फ़िर दीनदयाल भवन की मुखियागिरी के लिए ऐसी ही रायशुमारी हुई और उसमें अधिकांश मंडल इकाइयों से स्व सन्तोष वर्मा उभरकर सामने आये लेकिन अध्यक्ष कोई और नेता बन गया। वर्मा दुनिया से ही रुखसत कर गए। फिर भी भोपाल में बैठे बड़े नेताओ की गैरत नही जागी। फिर एक बार रायशुमारी में स्व उमेश शर्मा का नाम उभरकर सामने आया लेक़िन फिर भीपाल से इंदौर भाजपा के लिए नए नेता को भेज दिया गया। स्व उमेश भी मन मे मलाल ले दुनिया से अलविदा हो गए। ऐसे ही इंदौर के नाम से बने आईडीए में शहर के तमामं पात्र व योग्य नेताओ को दरकिनार कर इंदौर से बाहर के नेता को काबिज कर दिया गया। ऐसे एक नही, कई उदाहरण हैं। इस बार फिर नगर व जिलाध्यक्ष को लेकर रायशुमारी का डंका भाजपा में बजा है। अब देखना ये है कि इंदौर भाजपा को उसका हक मिलेगा या बड़े नेताओ के मर्जी के नाम पर भोपाल से मुहर लगेगी औऱ रायशुमारी एक बार फिर महज एक नाटक साबित होगी? या फिर पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं का मन बहलाने का साधन मात्र?_*
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कमलदल यानी भाजपा का नया नगर अध्यक्ष अब कभी भी प्रकट हो सकता हैं। इसकी कवायद बुधवार से शुरू हो रही हैं। इसमें पार्टी नेताओं से वन टू वन चर्चा की जाएगी। इस प्रक्रिया को रायशुमारी नाम दिया गया हैं। यानी सबकी सहमति और बहुमत से नेता का चयन हो। हालांकि इंदौर भाजपा के लिए पूर्व के अनुभव रायशुमारी को लेकर बेहद कड़वे रहें हैं। रायशुमारी में यहां जिस नेता के नाम सर्वानुमति रही, उसे पद नही मिला या दिया नही गया। इसकी जगह भोपाल में बैठे बड़े नेताओ ने अपनी पसन्द का नगर अध्यक्ष, इंदौर नगर पर थोप दिया। इसमे सत्ता व संगठन दोनों से जुड़े नेता शामिल रहे।
इस बार भी ऐसी नोबत न आये, इसे लेकर इंदौर भाजपा के नेता एकजुट हैं। सबकी मंशा है कि इंदौर का फैसला, इंदौर में ही हो जाये। भोपाल न जाये। राजधानी से इस मामले में ‘ जादू ‘ हो जाता हैं। वहां बैठे नेताओ का इन्दौरी हित आड़े आ जाता हैं। इस बार भी संघ, संगठन व भाजपा के बड़े नेताओं के हित एक बार फिर जागृत हो गए है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प रहेगा कि रायशुमारी ही कमलदल के नए सरदार की ताजपोशी का कारण बनेगी या बड़े नेताओं की पसंद, नापसंद को पूर्व की तरह तरज़ीह मिलेगी?
आज शहर भाजपा के लिए रायशुमारी होगी। जिले की भाजपा के लिए रायशुमारी की जाजम 26 दिसम्बर को बिछेगी। आज दीनदयाल भवन में दोपहर 3 बजे से रायशुमारी होगी। इसमे चुनाव प्रभारी रणवीर सिंह रावत व उनके सहयोगी घनश्याम शेर व डॉ उमाशशि शर्मा हेडमास्टर की भूमिका में रहेंगे। इन नेताओं के पास बंद कमरे में एक एक कर इंदौर भाजपा के नेता पहुचेंगे और अध्यक्ष के लिए मुफ़ीद नाम देंगे। इन नेताओं को कम से कम तीन नाम सुझाना होंगे ताकि ये पता चल सके कि किस नेता के नाम पर ज्यादातर नेता सहमत है।
जिन्हें बुलाया गया हैं, उन नेताओ की सूची लंबी चौड़ी हैं। इसमें सांसद, विधायक, मेयर, वरिष्ठ नेता, राष्ट्रीय पदाधिकारी, निगम मंडल के अध्यक्ष से लेकर ताजा ताजा बने मंडल अध्यक्ष व प्रतिनिधि शामिल होंगे। सत्यनारायण सत्तन से लेकर सुमित्रा महाजन तक को बुलावा भेजा गया हैं। ऐसे कुल 88 नेता बताए जा रहें हैं। बीते अनुभव को देखते हुए इस बार रायशुमारी को अहम माना जा रहा है। लिहाज़ा ज़्यादतर नेता आज दीनदयाल भवन की सीढ़ियां चढ़ते नजर आएंगे।
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*घर का मामला घर मे ही निपटाओगे या मुंह लटकाओगे?*
*दीनदयाल भवन का नया मुखिया खाँटी भाजपाई हो और खालिस इंदौरी भी। यानी भाजपा में ‘ आयातित नेता’ नही चलेगा और न अगल बगल के ज़िले, गांव, नगर, कस्बे का कोई नेता इंदौर में खपेगा। जिसे नगर की कमान मिले, उस नेता की जड़े भाजपाई हो और उसका डीएनए शुद्ध ‘ संघाई’ हो। ऐसा नही कि अन्य दल से राजनीति शुरू करने वाले भाजपा में आये नेता को कमान दे दी जाए। हालांकि ऐसी मनमानी करने की इजाज़त तो भाजपा का संविधान भी नही देता लेक़िन इसी संविधान को पार्टी के ही बड़े नेता, अपना निजी हित साधने के लिए ताक पर रख देते हैं। दुःख की बात तो ये है कि इस काम मे वे ही नेता शामिल हो रहें हैं, जिनके जिम्मे संगठन के नियम कायदों के पालन करने-करवाने की अहम जिम्मेदारी हैं। अब संगठन के नेता ही इस काम मे गहरे तक लिप्त है और महीनों पहले से अपने अपने नेताओं के पांव में अध्यक्षी के घुंघरू बंधवा देते हैं कि ये भाईसाहब का खास पट्ठा है, ये ही बनेगा। इस बार नियम कायदे कड़े है और इस पर दिल्ली दरबार की भी नज़र हैं। ऐसे में अब सारा दारोमदार इंदौर भाजपा से जुड़े नेताओ पर है कि वे गुटों में ही बटकर फिर एक बार इंदौर का फैसला भोपाल से करवाते है या घर का मामला घर यानी इंदौर में ही निपटाते हैं। मतभेद से परे रहे तो इंदौर के मिजाज का नेता मिलेगा नही तो वैसे ही सबको मुंह लटकाकर पदभार ग्रहण करवाना होगा, जैसे ‘रेसकोर्स रोड’ पर सब मुंह लटकाए कुर्सी के पीछे खड़े थे, जैसे किसी की शोकसभा में खड़े हो।*सूत्र
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