क्या आप इस आप्त शब्दाभिव्यक्ति से सहमत है कि वैसे तो सामान्यतः कर्म व कर्त्तव्य में कोई अंतर न होकर मनुष्य जीवन धर्म,दर्शन व अध्यात्म के मापदंड पर कर्त्तव्य प्रधान होकर कर्त्तव्य ही मनुष्य जीवन में व्यक्तिगत,पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर कर्मयोग, उद्देश्य व उत्तरदायित्व का निर्धारण व मार्गदर्शन कर बिना विघ्न व बाधा सार्थक लौकिक व पारलौकिक सार्थक सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
|
😊 Please Share This News 😊
|

