किस्मत न्यूज सिंगरौली, में हो रहा विनाश केवल आर्थिक विस्थापन नहीं है, बल्कि यह एक दोहरी मार है—एक ओर पूंजीवाद द्वारा भौतिक विनाश और दूसरी ओर एक विशेष विचारधारा द्वारा सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का खतरा। – किस्मत न्यूज

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किस्मत न्यूज सिंगरौली, में हो रहा विनाश केवल आर्थिक विस्थापन नहीं है, बल्कि यह एक दोहरी मार है—एक ओर पूंजीवाद द्वारा भौतिक विनाश और दूसरी ओर एक विशेष विचारधारा द्वारा सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का खतरा।

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किस्मत न्यूज़ सिंगरौली,डॉ विक्रम चौधरी प्रवक्ता, मध्य प्रदेश कॉंग्रेस कमिटी सिंगरौली की रुदन गाथा:जब 10,000 एकड़ जंगल कोयले की बलि चढ़े और संस्कृति उजड़ गई,अकरम पटेल की विशेष ख़बर

मध्य प्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र कहे जाने वाले सिंगरौली की धरती आज विकास के नारों के बीच एक गहरा रुदन कर रही है। यह रुदन है सदियों से वनों को अपनी माँ समझने वाले उन आदिवासी समुदायों का, जिनका पूरा संसार—उनकी आत्मा और उनकी आजीविका—सिर्फ एक व्यावसायिक परियोजना की भेंट चढ़ने जा रहा है। धीरौली कोल ब्लॉक परियोजना के तहत अडानी समूह को सौंपे गए 10,000 एकड़ से अधिक जंगल की जमीन और 6 लाख से 10 लाख पेड़ों की प्रस्तावित कटाई ने केवल पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि बैगा जैसे संवेदनशील आदिवासी समुदायों के हृदय को भी लहूलुहान कर दिया है।

सिंगरौली के हरे-भरे जंगलों में आज सचमुच एक माँ रो रही है। वह माँ जिसने महुआ के मीठे फूलों से अपने बच्चों को पाला है, तेंदू के पत्तों से घर की छत सजाई है और जंगल के पवित्र झरनों से जीवन का जल पिया है। आप कल्पना कीजिए, उनके लिए ये पेड़ मात्र लकड़ी नहीं हैं; ये उनके कुलदेवता हैं, ये उनकी सहोदर हैं, ये उनकी औषधियाँ हैं, उनके कबीलेकेसदस्य हैं। जब एक महुआ का पेड़ गिरता है, तो एक परिवार की रोटी टूट जाती है; जब एक तेंदू का पत्ता झड़ता है, तो एक बच्चे की पढ़ाई रुक जाती है। लेकिन आज, इस पूंजी की भूख ने उनके जीवन के इन सभी आधारों पर एक साथ प्रहार कर दिया है, 10 लाख पेड़ धराशायी होने की कगार पर हैं और उनके साथ ही आदिवासियों का पूरा संसार उजड़ रहा है।

विस्थापन का यह दर्द केवल आर्थिक नहीं है, यह संस्कृति का अंतिम संस्कार है। ये आदिवासी परिवार सदियों से अपनी संस्कृति की जड़ें इन घने जंगलों में जमाए जी रहे हैं। महुआ के फूलों से रोटी, तेंदू पत्तों से आजीविका, और पवित्र वनों में पूजा-अर्चना—ये सब छिन जाएंगे, तो उनकी पहचान ही मिट जाएगी। यह क्रूर ‘विकास’ उन्हें इस सहज जीवन से खींचकर शहरों की गलियों में धकेल देगा, जहाँ पानी बेचा जाता है, जहाँ शुद्ध हवा के लिए तरसना पड़ता है, और जहाँ उनकी सरल पूजा-पद्धतियाँ मजाक बन जाती हैं।

विविधता का विनाश: पूंजीवाद और सांस्कृतिक समरूपीकरण की दोहरी मार

सिंगरौली में हो रहा यह विनाश केवल पूंजीपतियों द्वारा संसाधनों के दोहन का मामला नहीं है; यह एक गहरी राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना का हिस्सा प्रतीत होता है। यह सर्वविदित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) वर्षों से आदिवासियों की मौलिक और प्रकृति-पूजक संस्कृतियों को समरूपीकरण (Assimilation) की परियोजना में धकेलने का प्रयास कर रहा है।

यह एक मनुवादी प्रक्रिया है, जिसका लक्ष्य दलित और आदिवासी संस्कृतियों को उनकी स्वतंत्र पहचान से वंचित करके उन्हें एक हिंदुत्ववादी पहचान में ‘ठूंस देना’ है।

इसका उद्देश्य स्पष्ट है:

 * वोट बैंक का निर्माण: उनकी विशिष्ट पहचान को बहुसंख्यक वोट बैंक में बदलकर राजनीतिक लाभ सुनिश्चित करना।

 * पुरोहित वर्ग का वर्चस्व: RSS जैसी विचारधाराओं का लक्ष्य भिन्न-भिन्न आस्था पद्धतियों को मंदिरों के हवाले कर देना है, जिससे पुरोहित वर्ग का सामाजिक और धार्मिक वर्चस्व खड़ा किया जा सके। जंगल की देवी और सहज प्रकृति पूजा की जगह, मूर्ति पूजा और मंदिर केंद्रित व्यवस्था थोपी जाती है।

यह विस्थापन इस वर्ण-आश्रमवादी परियोजना में ईंधन डालने का काम करता है। जब आदिवासी अपने जंगल (जो उनके देवी-देवताओं का घर है) से उखड़ जाते हैं, तो उनकी मौलिक आस्था पद्धतियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। विस्थापित होने के बाद, वे आसानी से ‘वनवासी कल्याण’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सांस्कृतिक रूप से आत्मसात (assimilate) कर लिए जाते हैं।

इस परियोजना के लिए पूंजीवाद एक साधन बन जाता है। अडानी जैसे बड़े पूंजीपतियों के साथ गठबंधन से उन्हें अकूत धन-संपदा मिलती है। यह सर्वविदित है कि RSS द्वारा निर्मित सैकड़ों करोड़ के भवन, कार्यालय और पूरे देश में भाजपा के फाइव स्टार शैली में बने विशालकाय मुख्यालय, इस गठजोड़ का जीता-जागता सबूत हैं। पूंजी का यह प्रवाह, राजनीतिक शक्ति के साथ मिलकर, आदिवासियों की भूमि और संस्कृति दोनों का विनाश सुनिश्चित करता है।

विदेशी मिशनरियों जितना ही विनाशकारी

यह समरूपीकरण की परियोजना उतनी ही विनाशकारी है, जितना कि अतीत में ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाया गया धर्मांतरण अभियान। जहाँ ईसाई मिशनरियों ने आदिवासियों को उनकी मूल आस्था से तोड़कर पश्चिमी धार्मिक पहचान दी, वहीं RSS की यह परियोजना उनकी प्रकृति-पूजक, समतावादी संस्कृति को तोड़कर उन्हें पदानुक्रमित (Hierarchical) और जातिवादी ढांचे में ढालने का प्रयास करती है। दोनों ही अभियानों में आदिवासियों की मौलिक पहचान और उनके स्व-शासन के अधिकार को नष्ट किया जाता है।

इस पूरे खेल में कानून और संवैधानिक अधिकारों का मखौल उड़ाया गया है। वन अधिकार अधिनियम (FRA 2006) स्पष्ट रूप से ग्राम सभा की पूर्ण और सूचित सहमति को अनिवार्य बनाता है, लेकिन विपक्ष (कांग्रेस) के नेताओं जैसे जयराम रमेश और स्थानीय कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस विशाल परियोजना को आगे बढ़ाने में ग्राम सभा की आवाज़ को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है। कांग्रेस नेता जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जब आदिवासियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे, तो उन्हें पुलिस की लाठियों और भारी बल प्रयोग का सामना करना पड़ा।

कथित तौर पर, लगभग आठ गाँवों को अधिसूचित क्षेत्र से हटाने का आरोप भी है, ताकि उन्हें विस्थापन पैकेज या FRA के तहत मिलने वाले सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों से वंचित किया जा सके। यह सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं है, यह पीढ़ियों की स्मृतियों, उनके धार्मिक विश्वासों और उनकी मौलिकता की लड़ाई है।

सवाल सिर्फ इतना है: क्या जंगल सिर्फ कोयले की खान है? क्या आदिवासी सिर्फ सरकारी आँकड़े हैं? आज, सिंगरौली की इस रुदन गाथा पर हर संवेदनशील भारतीय को आवाज उठानी होगी। एक पेड़ माँ के नाम, पूरा जंगल पूंजीपतियों के हवाले? नहीं! जंगल बचाओ, सभ्यता बचाओ, क्योंकि आदिवासियों की आवाज दबेगी नहीं, और विस्थापन तथा सांस्कृतिक समरूपीकरण की दोहरी मार से उनकी आत्मा को जो घाव लगेगा, वह कभी नहीं भरेगा।

 

आदरणीय सम्पादक महोदय 

 

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