किस्मत न्यूज़ रतलाम “मालवी लोक साहित्य में कृषि कर्म और जैविक चेतना का अंतर्संबंध” (शोध-प्रबंध पर समीक्षात्मक आलेख) रीपोर्ट मनोहर मालवीय रतलाम मालवा अंचल भारतीय लोकसंस्कृति की एक समृद्ध और जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ कृषि-कर्म, प्रकृति और जीव-जगत मानव जीवन के साथ गहरे सहजीवी संबंध में विकसित हुए हैं। इस अंचल की लोकपरंपराएँ केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के वैज्ञानिक और व्यवहारिक अनुभवों की मौखिक अभिलेख भी हैं। इसी पृष्ठभूमि में मुकेश ठन्ना का शोध-प्रबंध “मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति में कृषि एवं जीवविज्ञान बोध : एक अनुशीलन” लोक साहित्य, संस्कृति और विज्ञान के अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास है। यह शोध-प्रबंध लोकसाहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अथवा भावात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि कृषि एवं जीवविज्ञान जैसे वैज्ञानिक अनुशासनों के आलोक में विश्लेषित करता है। शोधकर्ता ने मालवी लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, मुहावरों, कहावतों, कृषक परंपराओं और लोक-उत्सवों को अध्ययन की सामग्री बनाकर यह प्रतिपादित किया है कि ग्रामीण समाज का जीवन-बोध प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन और अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित रहा है। इस दृष्टि से यह शोध लोकज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) की अकादमिक मान्यता की दिशा में एक सशक्त योगदान प्रदान करता है। शोध की कार्यप्रणाली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्षेत्रीय अध्ययन, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा मौखिक स्रोतों के संकलन के माध्यम से शोधकर्ता ने लोकगायकों, कृषकों और लोक कलाकारों के अनुभवों को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रक्रिया में मौखिक परंपरा को लिपिबद्ध कर शोध के दायरे में लाना न केवल सामग्री को विश्वसनीय बनाता है, बल्कि लुप्तप्राय लोकधरोहर के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। शोध-प्रबंध के अध्यायों में सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों का संतुलित विश्लेषण अध्ययन को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करता है। डॉ. सी.एल. शर्मा के निर्देशन तथा डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, नारायणी माया (जीजीबई) और डॉ. स्वर्णलता नागर के मार्गदर्शन ने शोध को विद्वत्तापूर्ण गंभीरता और वैचारिक स्पष्टता प्रदान की है। विशेषतः मालवी बोली की आत्मीयता और उसकी सांस्कृतिक लय शोध-भाषा में सहज रूप से परिलक्षित होती है, जिससे यह अध्ययन केवल अकादमिक न रहकर संवेदनात्मक स्तर पर भी पाठक को प्रभावित करता है। मालवी बोली की लयात्मकता, भावनात्मक गहराई और जीवन-दर्शन को शोध में जिस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है, वह इस बात को स्थापित करता है कि लोकभाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान की वाहक भी हैं। कृषि-चक्र, ऋतुओं का परिवर्तन, पशु-पक्षियों के व्यवहार और मानवीय श्रम का सामंजस्य इस शोध में जीवविज्ञान बोध के रूप में उभरकर सामने आता है, जो लोकसंस्कृति की वैज्ञानिक चेतना को उद्घाटित करता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह शोध विशेष महत्व रखता है। यह दर्शाता है कि लोकसंस्कृति और विज्ञान को परस्पर विरोधी न मानकर यदि समन्वयात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो स्थानीय ज्ञान-परंपराएँ सतत विकास, ग्रामीण उन्नयन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार यह शोध लोक साहित्य के अध्ययन को समकालीन विमर्शों से जोड़ने में सफल होता है। समग्रतः, मुकेश ठन्ना का यह शोध-प्रबंध मालवी लोक साहित्य, कृषि एवं जीवविज्ञान के समन्वित अध्ययन का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यह न केवल हिंदी लोकसाहित्य के क्षेत्र में मूल्यवान योगदान देता है, बल्कि भाषायी अध्ययन, लोकसंरक्षण और ग्रामीण विकास से जुड़े शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी संदर्भ सामग्री प्रदान करता है। शोधकर्ता की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और तकनीकी अनुभव ने अध्ययन को विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान की है, जिससे यह कार्य और अधिक प्रामाणिक बन पड़ा है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यह शोध-प्रबंध मालवा की लोकसंस्कृति को अकादमिक मंच पर स्थापित करने का एक सार्थक प्रयास है। भारतीय लोकभाषाओं और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण एवं पुनरुत्थान की दिशा में ऐसे शोध निस्संदेह भविष्य के अध्ययनों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होंगे। –ऋतेश पंवार शिक्षक, लेखक, – किस्मत न्यूज

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किस्मत न्यूज़ रतलाम “मालवी लोक साहित्य में कृषि कर्म और जैविक चेतना का अंतर्संबंध” (शोध-प्रबंध पर समीक्षात्मक आलेख) रीपोर्ट मनोहर मालवीय रतलाम मालवा अंचल भारतीय लोकसंस्कृति की एक समृद्ध और जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ कृषि-कर्म, प्रकृति और जीव-जगत मानव जीवन के साथ गहरे सहजीवी संबंध में विकसित हुए हैं। इस अंचल की लोकपरंपराएँ केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के वैज्ञानिक और व्यवहारिक अनुभवों की मौखिक अभिलेख भी हैं। इसी पृष्ठभूमि में मुकेश ठन्ना का शोध-प्रबंध “मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति में कृषि एवं जीवविज्ञान बोध : एक अनुशीलन” लोक साहित्य, संस्कृति और विज्ञान के अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास है। यह शोध-प्रबंध लोकसाहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अथवा भावात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि कृषि एवं जीवविज्ञान जैसे वैज्ञानिक अनुशासनों के आलोक में विश्लेषित करता है। शोधकर्ता ने मालवी लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, मुहावरों, कहावतों, कृषक परंपराओं और लोक-उत्सवों को अध्ययन की सामग्री बनाकर यह प्रतिपादित किया है कि ग्रामीण समाज का जीवन-बोध प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन और अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित रहा है। इस दृष्टि से यह शोध लोकज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) की अकादमिक मान्यता की दिशा में एक सशक्त योगदान प्रदान करता है। शोध की कार्यप्रणाली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्षेत्रीय अध्ययन, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा मौखिक स्रोतों के संकलन के माध्यम से शोधकर्ता ने लोकगायकों, कृषकों और लोक कलाकारों के अनुभवों को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रक्रिया में मौखिक परंपरा को लिपिबद्ध कर शोध के दायरे में लाना न केवल सामग्री को विश्वसनीय बनाता है, बल्कि लुप्तप्राय लोकधरोहर के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। शोध-प्रबंध के अध्यायों में सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों का संतुलित विश्लेषण अध्ययन को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करता है। डॉ. सी.एल. शर्मा के निर्देशन तथा डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, नारायणी माया (जीजीबई) और डॉ. स्वर्णलता नागर के मार्गदर्शन ने शोध को विद्वत्तापूर्ण गंभीरता और वैचारिक स्पष्टता प्रदान की है। विशेषतः मालवी बोली की आत्मीयता और उसकी सांस्कृतिक लय शोध-भाषा में सहज रूप से परिलक्षित होती है, जिससे यह अध्ययन केवल अकादमिक न रहकर संवेदनात्मक स्तर पर भी पाठक को प्रभावित करता है। मालवी बोली की लयात्मकता, भावनात्मक गहराई और जीवन-दर्शन को शोध में जिस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है, वह इस बात को स्थापित करता है कि लोकभाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान की वाहक भी हैं। कृषि-चक्र, ऋतुओं का परिवर्तन, पशु-पक्षियों के व्यवहार और मानवीय श्रम का सामंजस्य इस शोध में जीवविज्ञान बोध के रूप में उभरकर सामने आता है, जो लोकसंस्कृति की वैज्ञानिक चेतना को उद्घाटित करता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह शोध विशेष महत्व रखता है। यह दर्शाता है कि लोकसंस्कृति और विज्ञान को परस्पर विरोधी न मानकर यदि समन्वयात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो स्थानीय ज्ञान-परंपराएँ सतत विकास, ग्रामीण उन्नयन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार यह शोध लोक साहित्य के अध्ययन को समकालीन विमर्शों से जोड़ने में सफल होता है। समग्रतः, मुकेश ठन्ना का यह शोध-प्रबंध मालवी लोक साहित्य, कृषि एवं जीवविज्ञान के समन्वित अध्ययन का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यह न केवल हिंदी लोकसाहित्य के क्षेत्र में मूल्यवान योगदान देता है, बल्कि भाषायी अध्ययन, लोकसंरक्षण और ग्रामीण विकास से जुड़े शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी संदर्भ सामग्री प्रदान करता है। शोधकर्ता की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और तकनीकी अनुभव ने अध्ययन को विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान की है, जिससे यह कार्य और अधिक प्रामाणिक बन पड़ा है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यह शोध-प्रबंध मालवा की लोकसंस्कृति को अकादमिक मंच पर स्थापित करने का एक सार्थक प्रयास है। भारतीय लोकभाषाओं और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण एवं पुनरुत्थान की दिशा में ऐसे शोध निस्संदेह भविष्य के अध्ययनों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होंगे। –ऋतेश पंवार शिक्षक, लेखक,

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किस्मत न्यूज़ रतलाम “मालवी लोक साहित्य में कृषि कर्म और जैविक चेतना का अंतर्संबंध”

(शोध-प्रबंध पर समीक्षात्मक आलेख)

 

रीपोर्ट मनोहर मालवीय 

रतलाम मालवा अंचल भारतीय लोकसंस्कृति की एक समृद्ध और जीवंत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ कृषि-कर्म, प्रकृति और जीव-जगत मानव जीवन के साथ गहरे सहजीवी संबंध में विकसित हुए हैं। इस अंचल की लोकपरंपराएँ केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के वैज्ञानिक और व्यवहारिक अनुभवों की मौखिक अभिलेख भी हैं। इसी पृष्ठभूमि में मुकेश ठन्ना का शोध-प्रबंध “मालवी लोक साहित्य एवं संस्कृति में कृषि एवं जीवविज्ञान बोध : एक अनुशीलन” लोक साहित्य, संस्कृति और विज्ञान के अंतर्संबंधों को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास है।

यह शोध-प्रबंध लोकसाहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अथवा भावात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि कृषि एवं जीवविज्ञान जैसे वैज्ञानिक अनुशासनों के आलोक में विश्लेषित करता है। शोधकर्ता ने मालवी लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, मुहावरों, कहावतों, कृषक परंपराओं और लोक-उत्सवों को अध्ययन की सामग्री बनाकर यह प्रतिपादित किया है कि ग्रामीण समाज का जीवन-बोध प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन और अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित रहा है। इस दृष्टि से यह शोध लोकज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) की अकादमिक मान्यता की दिशा में एक सशक्त योगदान प्रदान करता है।

शोध की कार्यप्रणाली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्षेत्रीय अध्ययन, प्रत्यक्ष साक्षात्कार तथा मौखिक स्रोतों के संकलन के माध्यम से शोधकर्ता ने लोकगायकों, कृषकों और लोक कलाकारों के अनुभवों को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रक्रिया में मौखिक परंपरा को लिपिबद्ध कर शोध के दायरे में लाना न केवल सामग्री को विश्वसनीय बनाता है, बल्कि लुप्तप्राय लोकधरोहर के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। शोध-प्रबंध के अध्यायों में सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों का संतुलित विश्लेषण अध्ययन को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करता है।

डॉ. सी.एल. शर्मा के निर्देशन तथा डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, नारायणी माया (जीजीबई) और डॉ. स्वर्णलता नागर के मार्गदर्शन ने शोध को विद्वत्तापूर्ण गंभीरता और वैचारिक स्पष्टता प्रदान की है। विशेषतः मालवी बोली की आत्मीयता और उसकी सांस्कृतिक लय शोध-भाषा में सहज रूप से परिलक्षित होती है, जिससे यह अध्ययन केवल अकादमिक न रहकर संवेदनात्मक स्तर पर भी पाठक को प्रभावित करता है।

मालवी बोली की लयात्मकता, भावनात्मक गहराई और जीवन-दर्शन को शोध में जिस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है, वह इस बात को स्थापित करता है कि लोकभाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान की वाहक भी हैं। कृषि-चक्र, ऋतुओं का परिवर्तन, पशु-पक्षियों के व्यवहार और मानवीय श्रम का सामंजस्य इस शोध में जीवविज्ञान बोध के रूप में उभरकर सामने आता है, जो लोकसंस्कृति की वैज्ञानिक चेतना को उद्घाटित करता है।

आधुनिकता और वैश्वीकरण के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह शोध विशेष महत्व रखता है। यह दर्शाता है कि लोकसंस्कृति और विज्ञान को परस्पर विरोधी न मानकर यदि समन्वयात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो स्थानीय ज्ञान-परंपराएँ सतत विकास, ग्रामीण उन्नयन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। इस प्रकार यह शोध लोक साहित्य के अध्ययन को समकालीन विमर्शों से जोड़ने में सफल होता है।

समग्रतः, मुकेश ठन्ना का यह शोध-प्रबंध मालवी लोक साहित्य, कृषि एवं जीवविज्ञान के समन्वित अध्ययन का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यह न केवल हिंदी लोकसाहित्य के क्षेत्र में मूल्यवान योगदान देता है, बल्कि भाषायी अध्ययन, लोकसंरक्षण और ग्रामीण विकास से जुड़े शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी संदर्भ सामग्री प्रदान करता है। शोधकर्ता की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और तकनीकी अनुभव ने अध्ययन को विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान की है, जिससे यह कार्य और अधिक प्रामाणिक बन पड़ा है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यह शोध-प्रबंध मालवा की लोकसंस्कृति को अकादमिक मंच पर स्थापित करने का एक सार्थक प्रयास है। भारतीय लोकभाषाओं और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण एवं पुनरुत्थान की दिशा में ऐसे शोध निस्संदेह भविष्य के अध्ययनों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होंगे।

–ऋतेश पंवार

शिक्षक, लेखक, रंगकर्मी

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