किस्मत न्यूज़ इंदौर/यह सिर्फ़ भागीरथपुरा की कहानी नहीं है, यह हिंदी पत्रकारिता की साख, संघर्ष और जिम्मेदारी की कहानी है,,*ओम प्रकाश मालवीय – किस्मत न्यूज

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किस्मत न्यूज़ इंदौर/यह सिर्फ़ भागीरथपुरा की कहानी नहीं है, यह हिंदी पत्रकारिता की साख, संघर्ष और जिम्मेदारी की कहानी है,,*ओम प्रकाश मालवीय

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किस्मत न्यूज़ इंदौर *मंत्री जी द्वारा अमर्यादित भाषा का प्रयोग।*

 

*मीडिया हर सच्चाई सामने लाने का दम रखती है..!!

 

*भागीरथपुरा में जो हुआ, उसने सिर्फ़ एक इलाके की व्यवस्था की पोल नहीं खोली, बल्कि समाज और मीडिया के रिश्ते को भी आईना दिखाया,*

 

*सोमवार रात तक पूरी सच्चाई सामने आ चुकी थी, लेकिन मंगलवार की सुबह जब कैमरे और माइक गलियों में पहुंचे, तो लोगों की आंखों में शक था।*

*लोग कह रहे थे*

 

*“यह तो बिका हुआ मीडिया है, यह क्या असलियत दिखाएगा?”*

 

*यह अविश्वास यूं ही नहीं उपजा था। वर्षों से लोगों ने ऐसे दृश्य देखे थे, जहां खबरें दबाई जाती हैं, सवालों को मैनेज किया जाता है और पीड़ित की आवाज़ शोर में गुम हो जाती है। भागीरथपुरा भी उसी डर और गुस्से से भरा हुआ था।*

 

*लेकिन इसके बाद जो हुआ, वही असली पत्रकारिता थी।*

 

*मीडिया कर्मी सिर्फ़ कैमरा लेकर नहीं पहुंचे, वे कान लेकर पहुंचे—लोगों की बात सुनने के लिए।*

*वे सिर्फ़ बयान लेने नहीं आए, वे सवाल लेकर आए—प्रशासन से, सिस्टम से, जिम्मेदारों से।*

*हर गली, हर घर, हर आंसू, हर शिकायत को सुना गया।*

*भागीरथपुरा के चक्कर लगे, अधिकारियों नेताओं से सवाल हुए, आंकड़ों को खंगाला गया और उन परिवारों से बात की गई, जिनके घरों में मौत दस्तक दे चुकी थी।*

 

*यह आसान नहीं था।*

*तीन दिन तक गली-गली घूमना, पीड़ा सुनना, गुस्सा झेलना और फिर भी निष्पक्ष रहना—यह वही काम है, जिसे पत्रकारिता कहा जाता है।*

 

*मृतकों के परिजनों के बयानों से मौत के आंकड़ों की सच्चाई सामने आई।*

*जो आंकड़े काग़ज़ों में दबाए जा रहे थे, वे कैमरे के सामने आ गए।जो दर्द फाइलों में अनदेखा था, वह स्क्रीन पर और अखबारों में दिखने लगा।*

 

*और फिर, धीरे-धीरे माहौल बदला।*

 

*तीन दिन पहले जो लोग मीडिया पर सवाल खड़े कर रहे थे, वही लोग अब गलियों से गुजरते पत्रकारों से हाल-चाल पूछने लगे।*

*धन्यवाद कहने लगे।*

*यह स्वीकार करने लगे कि—*

*“हां, यही तो मीडिया का काम है।”*

 

*भागीरथपुरा की तस्वीर बदली, लेकिन उससे भी बड़ी बात बदली लोगों की सोच।*

*लोगों ने देखा कि जब पत्रकारिता अपने मूल धर्म पर लौटती है—तो वह सत्ता से नहीं डरती, सच से समझौता नहीं करती और पीड़ित के साथ खड़ी होती है।*

 

*यह उन तमाम आरोपों का जवाब था, जो अक्सर हिंदी मीडिया पर लगाए जाते हैं।*

*यह साबित हुआ कि मीडिया सिर्फ़ टीआरपी नहीं, जिम्मेदारी भी है।और जब हर पत्रकार अपने हिस्से की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाता है, तो तीन दिन भी काफी होते हैं नजरिया बदलने के लिए, व्यवस्था को झकझोरने के लिए और सच को सामने लाने के लिए।*

 

*भागीरथपुरा में लोगों ने इस बार सिर्फ़ खबरें नहीं देखी,*

*उन्होंने पत्रकारिता की ताकत भी देखी..*

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