1857 क्रांति की असफलता के चलते सर सैयद का घर तबाह हो गया उनके परिवार के भी कई लोग मारे गए। इस क्रांति में मुस्लिम समाज का ढांचा टूट गया दिल्ली में हज़ारो उलेमाओं फांसी पर चढ़ा दिया गया।
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17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में सर सैय्यद अहमद की पैदाइश हुई इनके नाना मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबार मे वज़ीर थे जबकि दादा मुंसिब थे। कुछ दिन सर सैयद ने भी मुगल दरबार मे नौकरी की 1842 में भारत के आखरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने उन्हें “जवद उद दाउलाह” उपाधि से सम्मानित किया था।
1857 क्रांति की असफलता के चलते सर सैयद का घर तबाह हो गया उनके परिवार के भी कई लोग मारे गए। इस क्रांति में मुस्लिम समाज का ढांचा टूट गया दिल्ली में हज़ारो उलेमाओं फांसी पर चढ़ा दिया गया। अंग्रेजों ने साज़िश के तहत स्कूल की किताबों को उर्दू फ़ारसी से बदल कर अंग्रेजी में कर दी जिसके वजह से मुसलमानों ने विरोध किया और अंग्रेजी ज़ुबान में पढ़ने से इनकार कर दिया। मुसलमान ने बच्चों को स्कूल भेजना बन्द कर दिया और यही से मुसलमान स्कूल और शिक्षा से दूर होने होते गए। बिना अंग्रेजों की जुबान के बड़े ओहदों पर नोकरी मिलना बंद हो गयी। और मुस्लिम समाज बेरोजगारी और अशिक्षा की ओर बढ़ता गया।
सर सैयद 100 साल आगे की सोचते थे मुसलमानो की आने वाली स्थिति को भांप गए थे। पूरा खानदान मुग़ल दरबार मे बड़े ओहदों पर था खुद उन्हें भी मुग़ल दरबार मे अच्छा ओहदा मिला था उसके बावजूद मुग़ल दरबार छोड़कर ब्रिटिश हुक़ूमत में नौकरी कर ली।
फतेहपुर, मैनपुरी, मुरादाबाद, बरेली, ग़ाज़ीपुर कई जगह कार्यरत रहे और बनारस के स्माल काजकोर्ट के जज पद से सेवानिवृत हुए। अंग्रेजों ने इनकी सेवा व निष्ठा को देखते हुए इन्हें ”सर” की उपाधि से विभूषित किया था।
नोकरी में रहते हुए मुरादाबाद, बरेली, ग़ाज़ीपुर और अलीगढ़ में उन्होंने कई आधुनिक स्कूल, कॉलेजों और संगठनों की स्थापना की।
आधुनिक शिक्षा और अंग्रेजी ज़ुबान के चलते उन पर अंग्रेजों के वफादार होने का इल्जाम लगा यहां तक कुफ़्र तक के फ़तवे लगे। इस फतवे के पीछे वजह जो कुछ भी रही हो लेकिन सर सैय्यद ने मुस्लिम समाज को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का बेहतरीन काम किया था।
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