महिला दिवस पर विशेष”*    *देश की प्रथम महिला टेक्नीशियन: यासमीन बानो*   *मर्दों के काम में महारत हासिल की*      तालिब हुसैन पत्रकार – किस्मत न्यूज

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महिला दिवस पर विशेष”*    *देश की प्रथम महिला टेक्नीशियन: यासमीन बानो*   *मर्दों के काम में महारत हासिल की*      तालिब हुसैन पत्रकार

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जबलपुर. सिर्फ सात साल की मासूम जबलपुर की यासमीन जब सदर स्थित वर्क शाप में अपने पिता के साथ उनके काम में हाथ बंटाती थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि भोली भाली यह नादान बच्ची एक दिन भारत की फर्स्ट वूमन टेक्नीशियन बनकर देश में जबलपुर का नाम रोशन करेगी. सदर गली नम्बर साथ स्थित एशियन आल राउंड मिकैनिकल वर्कशाप में आज भी जब लोग यासमीन को मर्दों का काम करते देखकर हैरान हो जाते हैं. मोटर बाईंडिंग, कूलर, सीलिंग फेन, टेबिल व वाल फेन, मिक्सर ग्राइंडर, फूड प्रोसेसर, एकजास्ट फेन, वाशिंग मशीन, टिल्लू पम्प, गीजर, मिक्सी, हीटर, ओवन,

हीट कन्वेक्टर, ओटीजी, ओवन, टोस्टर, गीजर, आटो आयरन और वोह सब उपयोग उपकरण बनाने में यासमीन को महारत हासिल है, जिस कुरूक्षेत्र में कभी पुरूषों का दबदबा रहा करता था. कहने को तो यासमीन बानो के पिता स्व. गुलाम शब्बीर हुसैन को भी उनके काम के कारण उस्ताद कहकर पुकारा जाता था, लेकिन खेलने कूदने की उम्र में पाना, पिनचिस, हथौड़ी और बिजली के उपकरणों के साथ दोस्ती करने वाली “उस्ताद” से बहुत आगे जा चुकी है. पिता के ज़माने में जिन उपकरणों का वजूद ही नहीं था, उन उपकरणों का फाल्ट पकड़कर उन्हें उपयोगी बनाना यासमीन के दांए हाथ का खेल है.

यासमीन के हर काम में गारन्टी होती है. जिस सामान को भी उसने हाथ लगाया तो फिर मान लो कई साल उसमें कोई फाल्ट नहीं हो सकता है. 

 *मेहनत का नहीं हुआ मूल्यांकन* 

चार दशकों से दिन रात मेहनत कर अपने काम को जुनून की तरह अंजाम देने वाली यासमीन को इस बात का मलाल है कि ना तो सामाजिक स्तर पर और ना ही शासन ने उसकी मेहनत और काबलियत का मूल्यांकन किया.

 एक भाई व तीन बहनों के बीच सबसे बड़ी यासमीन आज भी अविवाहित है. पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वोह खुद का घर नहीं बसा सकी. माता पिता दोनों दुनिया में नहीं है. ऐसे में ऐसे में जिंदगी गुज़ारना कितना कठिन है, इसका अहसास वही कर सकती है. 

 *देशव्यापी पहचान है यासमीन की* 

कहने को तो अपने हुनर के दम पर इस महिला तकनीशियन ने देशव्यापी शौहरत हासिल की है.

चाहे न्यूज चैनल हों या प्रिंट मीडिया, सबने समय समय पर यासमीन की हौसला अफजाई की है, गैर राजनीतिक संगठनों ने भी ढेरों अवार्ड दिए हैं, इससे यासमीन को सिर्फ शौहरत मिली, सम्मान मिला, लेकिन आर्थिक रूप से किसी तरह का लाभ नहीं मिला है, जिसकी वह हकदार है. 

 *सपोर्ट मिलने पर बहुत आगे जा सकती है यासमीन* 

    किराए की दुकान में वर्क शाप चलाने वाली होनहार व हुनरबाज़

यासमीन को यदि सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर आर्थिक रूप से 

सपोर्ट मिल जाए, तो वोह काफी आगे जा सकती है. आज भी यासमीन 17- 18 घण्टे वर्क शाप में बिताती है. उसने हिम्मत नहीं हारी है..वह कहती है ख़ुदा के घर देर है अंधेर नहीं..उसे भरोसा है कि एक ना एक दिन उसकी मेहनत का मूल्यांकन होगा और अंधेरी जिंदगी में रोशनी आएगी..

लेकिन कब..? शायद एसका जवाब किसी के पास नहीं है..

(लेखक जबलपुर में फाउंडर टीवी जर्नलिस्टस हैं).

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