हाई टेक युग में भी जारी है सेहरी के लिए रोज़ेदारों को जगाने की रस्म* *गली मुहल्लों में घूमती है टोली* *तालिब हुसैन*
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जबलपुर. बात रमज़ान की है तो इफ्तार की चर्चा तो होगी ही, लेकिन सेहरी का जिक्र ना हो ऐसा मुमकिन नहीं है. दरअसल जो लोग रमज़ान के रोज़े रखते हैं वोह रात तीन बजे से लेकर चार, सवा चार बजे तक चाय पानी पीने या हल्का नाशता करने उठते हैं, इस रस्म को सेहरी कहा जाता है. कई बार लोग नींद से बेदार नहीं हो पाते हैं जिससे बिना सेहरी के उन्हें रोज़ा रखना पड़ता है. यही वजह है कि लोगों को सेहरी के लिए जगाने वाली टोलियां रात के अंधेरे में गली मुहल्लों में दस्तक देती हैं. हालांकि यह परम्परा सदियों पुरानी है. गुज़रे ज़माने में जब ना घड़ियां थीं और ना मोबाइल. और ना ही वोह हाईटेक संसाधन, जिनसे समय का पता लगाया जा सके. लेकिन मौजूदा वैज्ञानिक युग में हर तरह के संसाधन होने के बावजूद सेहरी जगाने वाली टोलियों ने नेकी की इस रस्म को इतिहास बनने नहीं दिया.
मदार टेकरी निवासी बाबू आसिफ अपनी टीम के साथ सदर की गलियों में रतजगा करते हैं. उनके साथ मुहम्मद सिकंदर, मुहम्मद समीर व मुहम्मद साजिद
घर घर दस्तक देकर रोज़ेदारों को आगाह करते हैं कि नींद से जागो सेहरी का वक्त हो गया है.
समाजसेवी हाजी मकबूल अहमद रज़वी कहते हैं सेहरी के लिए जगाना सवाब व नेकी का काम है. सदियों पुरानी परम्परा को बचाए रखना सराहनीय पहल है.
सरवर खान अकबर का मानना है कि मौजूदा दौर में भी बाबू आसिफ व उनकी टीम
खुद की नींद को भूलकर सेहरी जगाने का काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं. जिसके लिए वह मुबारकबाद के हकदार हैं.
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