सूरह मुहम्मद की आयत नम्बर 37 व 38 में मौमिनों से कहा गया है कि वे अल्लाह की राह में अपनी दौलत खर्च करें
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” फिक्र ऐ नूरानी “
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Respected sisters and brothers,
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकतुल्लाह।
“छब्बीसवां पारह हा-मीम का ख़ुलासा (summary)”
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(1) ये पारह सूरह अहक़ाफ (मुकम्मल),सूरह मुहम्मद (मुकम्मल),सूरह फतह (मुकम्मल),सूरह होजोरात (मुकम्मल),सूरह क़ाफ(मुकम्मल) और सूरह ज़ारियात के शुरुआती हिस्सा पर मबनी है।
(2)सूरह अहक़ाफ की आयत नम्बर 03 में बयान है कि अल्लाह सुबहाना तआला ने ज़मीन,आसमान और उनके दरम्यान मौजूद तमाम चीजों को हक़ की बुनियाद पर एक मुक़र्रर वक्त तक के लिए तख़लिक़ की हैं।
(03)सूरह अहक़ाफ की आयत नम्बर 15 में वालदीन ( खासकर माॅ के हवाले से) की खिदमत का हुक्म बयान हुआ है,और इस हवाले से इंसानी क़द्र “शुक्र” (gratitude/ thankfulness)की इब्ने आदम के तर्जे अमल मे अहमियत बयान की गई है।इसके लिए बहतरीन दुआ भी बयान की गई है।
(04)सूरह अहक़ाफ की आयत नम्बर 29 से 32 में जिन्नातों के एक गिरोह का ज़िक्र है,जिसने क़ुरआन को सुना और अपनी क़ौम को बताया कि क़ुरआन मूसा के बाद उतारी गई किताब है,जो सीधी राह की रहनुमाई करतीं है,तो अल्लाह की दावत को कबूल करना चाहिए।
(05)सूरह मुहम्मद की आयत नम्बर 01में बयान है कि अल्लाह के रास्ते से रोकने वाले काफिरों के तमाम आमाल ग़ारत हो जाते हैं।
(6) सूरह मुहम्मद की आयत नम्बर 15 में जन्नत के इनामात और जहन्नुम के अजाबात का जिक्र है।
(7)सूरह मुहम्मद की आयत नम्बर 36 में अल्लाह सुबहाना तआला फरमाता है कि दुनिया की जिंदगी खेल तमाशा है। ईमान व परहेज़गारी पर चलने वालों की जिंदगी ही कामयाब है।
(08) सूरह मुहम्मद की आयत नम्बर 37 व 38 में मौमिनों से कहा गया है कि वे अल्लाह की राह में अपनी दौलत खर्च करें।
(09)सूरह फतह की आयत नम्बर 01में हुदैबिया की सुलह के पसमंजर में बयान है कि यह सुलह मुसलमानों के लिए फतह जैसी थीं।
(10)सूरह फतह की आयत नम्बर 23 में बयान है कि सुन्नतल लाही यानि अल्लाह की सुन्नत (दस्तूर) में कभी भी कोई तब्दीली नहीं होती है।
(11)सूरह फतह की आयत नम्बर 27 में रसूलुल्लाह(स.ल.व.)को मस्जिदें हराम यानि अदब वाली मस्जिद में अपने साथियों के साथ उमरा करते हुए ख्व़ाब देखने का ज़िक्र है।
(12)सूरह होजोरात की आयत नम्बर 09 व 10 में अल्लाह सुबहाना तआला फरमाता है कि ईमान वाले आपस में भाई भाई है,और इनके बीच टकराव होने पर सुलह करवा दो।ज्यादती करते वालों से लड़ो,ज्यादती करने वाला अपना रास्ता दुरस्त करले,तो दोनों मे इंसाफ से सुलह करा दो।अल्लाह इंसाफ करने वालों से मुहब्बत करता है।
(13) सूरह होजोरात की आयत नम्बर 11 में अल्लाह सुबहाना तआला ने तर्ज़े अमल के हवाले से कई अहकामात सादिर कर फरमाया है कि कोई कौम किसी दूसरी कौम को नीच समझकर हंसी न उड़ाऐ,औरतें भी दूसरी औरतों का दिल दुखाने के लिए ठट्ठा न करे,एक दूसरे पर ऐब न लगाऐ,बुरे लकब व बुरे नाम न धरे।
(14)सूरह होजोरात की आयत नम्बर 12 में अल्लाह सुबहाना तआला फरमाता है कि गुमान से बचो क्योंकि कोई गुमान गुनाह भी बन जाता है।एक दूसरे के भेद न टटोले और पीठ पीछे एक दूसरे की ग़ीबत न करे ।ग़ीबत करना अपने मरे भाई का गोश्त खाने जैसा है।
(15) सूरह क़ाफ की आयत नम्बर 16 मे ज़िक्र है कि अल्लाह सुबहाना तआला इंसानो को पैदा करने वाला है,और इंसानो को आने वाले ख्यालों से भी वाकिफ होता है, क्योंकि वह इंसान से उसकी गर्दन की रग से भी ज्यादा क़रीब है।( व नहनू अक़रबु ईलयही मिन हबलील वरीद)
इक़बाल “नूरानी “
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Regards:Iqbal Khan Gauri,Retired District Judge,M.P.
Now:Law adviser & Human duties Activist,Ujjain.
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