किस्मत न्यूज़ भोपाल :- आंकड़ों का चमत्कार और अर्थव्यवस्था की हकीकत ! — विकास की गाड़ी या भ्रम की बग्घी? डॉ. विक्रम चौधरी प्रवक्ता, मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी।
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किस्मत न्यूज़ भोपाल :- सरकार बता रही है कि विकास की गाड़ी ऐसी रफ्तार से दौड़ रही है कि कोई उसे पकड़ ही नहीं सकता। ताज़ा सरकारी घोषणा के मुताबिक GDP-growth 8.2% पर पहुँच गई है। यह दावा ऐसा है मानो भारत ने एक ही छलाँग में चीन को पीछे छोड़ आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता साफ कर लिया हो। अकरम पटेल की विशेष ख़बर
और तो और, सरकार कहती है कि महंगाई घटते-घटते 0.25% पर आ पहुँची है—इतनी कम कि विकसित देशों को भी शर्म आ जाए।
अर्थात—जीडीपी चीन वाली, और महंगाई स्विट्ज़रलैंड वाली।
अगर आंकड़ों की यही जादुई गति बनी रही तो 2047 का इंतज़ार छोड़िए, विकसित भारत नया साल आते-आते तैयार मिल जाएगा, तो फिर क्या है चीखते रहो जै चिली लाम।
लेकिन समस्या यह है कि देश आगे बढ़े इससे पहले… आंकड़े ही भागने लगे हैं। जिस तिमाही में सरकार दावा कर रही है कि GDP आसमान छू रही है, उसी तिमाही में:
सबसे बड़ी FMCG कंपनी HUL की बिक्री 1% भी नहीं बढ़ी।
देश के सबसे बड़े निजी बैंक HDFC के लोन वितरण में मुश्किल से 4% का इजाफ़ा।
स्टेट बैंक जैसे दिग्गज में भी वृद्धि नगण्य।
और चमत्कार तो तब हुआ जब विशेष कृपापात्र अडानी एंटरप्राइजेज़ ने भी अपने कारोबार में 6% की कमी दिखाई, जिसकी सेवा में स्टेट बैंक और पूरा एलआईसी का पैसा लगा हुआ है।
जब देश की GDP झरने की तरह बह रही है, तो भारत की कॉर्पोरेट दुनिया सूखे की मार क्यों झेल रही है? पिछले दिनों पिछले दिनों शेयर बाज़ार में जो कृत्रिम स्थिरता (Artificial Stability) दिखाई गई थी, वह वास्तव में सरकार और उससे जुड़ी वित्तीय संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर बाजार में पैसा झोंकने का परिणाम था। यह मामला सरकार के लिए राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील था, इसलिए इसे आधिकारिक रूप में स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन आर्थिक विश्लेषकों, स्वतंत्र ब्रोकरेज रिपोर्टों और FIIs के व्यवहार से यह साफ़ संकेत मिला कि बाज़ार को गिरने से जानबूझकर बचाया गया।क्या हुआ था? — बाजार तेज़ी से गिर रहा था
एक सप्ताह के भीतर–
FIIs ने भारी मात्रा में सेलिंग की
रुपये में गिरावट बढ़ी
ग्लोबल संकेत नकारात्मक थे
घरेलू कंपनियों के नतीजे अपेक्षा से कमजोर आए
इन सब कारणों से Sensex–Nifty में गहरी गिरावट की संभावना बन गई थी।
लेकिन अचानक बाज़ार अगले ही दिन तेज़ी से हरा दिखने लगा। सरकार की हस्तक्षेप हुआ और निर्देशानुसार LIC और अन्य सरकारी फंडों ने भारी खरीदारी की।
ऐसे में एक ही निष्कर्ष बचता है—
कहीं न कहीं आंकड़ों का खेल चल रहा है और असल अर्थव्यवस्था कुछ और कह रही है। IMF की C-ग्रेड: डेटा आता है, पर समझ नहीं आता ? भारत को IMF ने B से गिराकर C-ग्रेड (थर्ड डिवीजन) दे दी
और साथ में यह टिप्पणी भी कर दी कि भारत के GDP डेटा में इतने पद्धतिगत झोल हैं कि IMF को उसकी निगरानी में ही कठिनाई आने लगी है।
उनके शब्दों में भारत के डेटा की समस्या ये है:
उत्पादन आधारित GDP और खर्च आधारित GDP में बड़ा अंतर;
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की अधूरी कवरेज;
सीज़नली एडजस्टेड डेटा का अभाव;
त्रैमासिक अनुमान निकालने की विधि कमजोर।
यानि IMF के मुताबिक—
डेटा समय पर आ जाता है, बस उसकी गणित समझने में उनके छक्के छूट जाते हैं।
जब अंतरराष्ट्रीय संस्थान डेटा की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न उठा रहे हैं, तब सरकार का 8.2% से आत्ममुग्ध होना आर्थिक हकीकत नहीं, बल्कि प्रचार की कला है।
वर्ल्ड बैंक कर्ज और राजकोषीय घाटा: विकास नहीं, उधार का उत्सव
GDP-growth के दावों के पीछे जो वास्तविक इंजन चल रहा है, वह सरकारी उधारी है। राजकोषीय घाटा हर साल ऊँचा होता जा रहा है और सरकार को बढ़ती मात्रा में बाहरी कर्ज लेना पड़ रहा है।
वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं पर भारत की निर्भरता पिछले वर्षों में लगातार बढ़ी है।
यदि अर्थव्यवस्था इतनी बलवान होती, तो देश को इतनी भारी उधारी की ज़रूरत क्यों पड़ती?
भारत का व्यापार असंतुलन: निर्यात ठहरा, आयात बढ़ा
किसी भी मज़बूत अर्थव्यवस्था की पहचान उसका व्यापार संतुलन होता है।
लेकिन भारत में—
निर्यात ठहरा हुआ है,
आयात लगातार बढ़ रहा है,
और व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर।
अगर GDP सच में 8.2% की रफ्तार से बढ़ रही होती, तो वाणिज्यिक संतुलन हर साल बदतर क्यों होता?
रोज़गार का संकट — यह कैसी वृद्धि जो काम न दे सके?
GDP बढ़ रही है, पर नौकरी कहाँ?
युवा बेरोजगारी एशिया में सबसे ऊँचे स्तरों में,
सरकारी नौकरियाँ वर्षों से खाली,
MSME क्षेत्र पुनर्जीवित होने की जगह संघर्षरत, और नए अवसर gig-economy व अस्थायी श्रम तक सीमित।
GDP-growth जो रोजगार पैदा न कर सके वह कागज़ी विकास है—न कि जनता का वास्तविक उत्थान।
भारत की क्रय-शक्ति दुनिया में 12–13 स्थान पर — विकास का लाभ आम जनता तक नहीं।
सबसे बड़ा सच यह है कि भारत की प्रति व्यक्ति क्रय-शक्ति दुनिया में 12–13वें स्थान पर है।
यानि GDP ऊपर भाग रही है,
और भारतीयों की जेब खाली दौड़ रही है।
विकास अगर जनता तक न पहुँचे तो वह सिर्फ राजनीतिक नारा है, आर्थिक उपलब्धि नहीं। भारत को विकास के नारे की नहीं, सच्चाई की जरूरत है
आज देश में दो भारत बन चुके हैं—
एक कागज़ों में चमकता हुआ भारत
और दूसरा वास्तविक भारत—जहाँ महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज, व्यापार घाटा और अनिश्चितता का बोझ बढ़ता जा रहा है।
सरकार का GDP-growth का दावा इसलिए भ्रमकारी है क्योंकि वह:
IMF की C-ग्रेड,
बढ़ते राजकोषीय घाटे,
विदेशी कर्ज,
व्यापार असंतुलन,
रोजगार संकट,
और गिरती क्रय-शक्ति
—इन सभी कठोर आर्थिक संकेतकों से मेल नहीं खाता।
वहीँ रुपये की गिरती कीमत और ऊपर जाती जीडीपी के विरोधाभास पर एक ग्रंथ लिखा जा सकता है, रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बना हुआ है, इतने होते हुए GDP का चमकदार आंकड़ा
भूख, बेरोजगारी और गिरते जीवन-स्तर की हकीकत को छुपा नहीं सकता।
डॉ. विक्रम चौधरी
प्रवक्ता, मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी
(यह आलेख सरकार द्वारा प्रस्तुत भ्रामक आर्थिक आकलनों के विरुद्ध एक तथ्यपरक प्रतिवाद है।)
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