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*कांग्रेस के 39 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट*

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*आंखों के इशारे से रुकतीं गाड़ियां, सरेआम सेक्स, हाइवे पर सज रही जिस्म की मंडी…*

 

*👆💯अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस…???👆*

 

*ओमप्रकाश मालवीय*

 

*महिलाओं पर, खासतौर से शोषित-पीड़ित वर्ग की महिलाओं पर, लगातार अत्याचार बढ़ता जा रहा है.*

 

*धर्म की आड़ में उन अत्याचारों को जायज ठहराया जा रहा है. सामंती गुण्डे, पत्रकार, नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-अफसर, बड़े पूंजीपति शोषक वर्गों के साधू, संत, महन्त, पीर, मुजावर, औलिया तथा शोषक वर्ग का अन्य कोई भी तबका बाकी नहीं, जो महिलाओं के विरुद्ध शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचार न करता हो.*

 

*शोषक वर्ग के लोगों ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु बना दिया है. पूँजीवादी साम्राज्यवादी शोषक वर्ग अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए औरतों की नग्नता को बढ़ावा देता जा रहा है.*

 

*”यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते, तत्र देवता” महज एक जुमला बना हुआ है.*

 

*शोषक वर्ग ने एक ऐसा माहौल बना रखा है कि हर जगह महिलाओं पर खतरा न सिर्फ बना हुआ है बल्कि बढ़ता जा रहा है. आफिसों, बाजारों, दुकानों, स्कूलों, अस्पतालों, कारखानों, रेलों, सड़कों, हवाई जहाजों…कहीं भी महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं.*

 

*टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया के जरिए गन्दगी परोस कर घरेलू परिवेश को भी इतना गन्दा बना दिया है कि महिलाएँ घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं.*

 

*मौजूदा सरकार एक तरफ महिला सशक्तीकरण का नारा लगा रही है, दूसरी तरफ आँगनवाड़ी, आशाकर्मी, स्कीम वर्कर के तौर पर कार्यरत महिलाओं के श्रम का जबर्दस्त शोषण कर रही है. सबसे ज्यादा उत्पीड़न भूमिहीन, गरीब किसान व मजदूर वर्ग की महिलाओं का हो रहा है.*

 

*दर असल जिस वर्ग का सबसे ज्यादा शोषण होता है उसी वर्ग का सबसे ज्यादा उत्पीड़न भी होता है.*

 

*महिलाओं की इन बदतर हालातों के लिए वही शोषक वर्ग ही जिम्मेदार है, जो अपने मुनाफे और एकाधिकार के लिए मौजूदा शोषणकारी व्यवस्था को चला रहा है.*

 

*परन्तु कुछ नारीवादी लोग सभी पुरुषों को जिम्मेदार ठहराकर जहां एक तरफ गरीब महिलाओं को गरीब पुरुषों के खिलाफ भड़काकर हर घर में ही झगड़ा लगाने का काम करते हैं; वहीं दूसरी तरफ वे शोषक वर्ग द्वारा किए जा रहे जघन्य शोषण को छिपाने का भी काम करते हैं. ऐसे नारी वादियों से महिलाओं को सावधान रहना चाहिए.*

 

*इसलिए शोषित-पीड़ित महिलाओं को शोषित-पीड़ित पुरुषों के साथ मिलकर ही शोषक वर्ग के खिलाफ अपनी आजादी की लड़ाई लड़नी चाहिए.*

 

*आजादी की लड़ाई शुरू करने के लिए गुलामी के कारणों को जानना होगा. गुलामी के कारणों का भौतिक समाधान ढूँढ़ना होगा.*

 

*पुराने जमाने में महिलाएँ आजाद थीं. बच्चों को पालने-पोषने, उनकी देख-रेख करने, बूढ़ों की देखभाल आदि घरेलू काम महिलाएँ पहले से ही करती रही हैं, मगर आदिम क़बीलाई युग में बच्चों को पालने-पोषने, उनकी देख-रेख करने, बूढ़ों की देखभाल आदि कामों के साथ-साथ महिलाएँ खेती, बागवानी, शिकार आदि सामाजिक उत्पादन का काम भी करती थीं.*

 

*सामाजिक उत्पादन के काम में लगी होने के कारण महिलाएँ शारीरिक रूप से भी बलिष्ठ होती थीं. पूरे कबीले पर महिलाओं का तब दबदबा था.*

 

*जब आग की खोज हो गई, तब उन चीजों को भी मनुष्य खाने लगा जिन्हें कच्चा नहीं खा सकता था. इससे खाने-पीने की चीजों का दायरा बढ़ गया. खाने-पीने की चीजों की पैदावार भी बढ़ गयी, जिससे बचत में बढ़ोत्तरी होने लगी.*

 

*एकत्रित भोज्य पदार्थों की रखवाली करना और भोजन पकाने, आग को संरक्षित रखने, बूढ़ों, बच्चों की देख-भाल, अनाज, दूध आदि के रख-रखाव, झाड़ू-पोंछा आदि घरेलू काम बढ़ता गया.*

 

*उस वक्त भोथरे औजारों से खेती करने, शिकार करने की तुलना में यह काम आसान था, इस आसान काम को महिलाओं ने अपने ऊपर ले लिया. महिलायें खेतों, बागीचों में काम करने व शिकार करने का काम छोड़ती चली गयीं. खेती, बागवानी, शिकार, पशुपालन के काम ज्यादातर पुरुष ही करने लगा. इससे पुरुषवर्ग शारीरिक तौर पर मजबूत होता गया और महिलाएँ कमजोर होती चली गयीं.*

 

*आगे चलकर जो उत्पादन करता था, उसी को उत्पादित सम्पत्ति के रखरखाव और खरीदने बेचने का अधिकार दे दिया गया जिससे निजी सम्पत्ति का उद्भव हुआ.*

 

*चूँकि पुरुष वर्ग ही उस वक्त सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगा हुआ था इस लिए निजी सम्पत्ति का मालिकाना अधिकांशत: पुरुषों को ही मिला..*

 

*ज्यों-ज्यों पुरुषों के हाथ में निजी सम्पत्ति बढ़ती गयी त्यों-त्यों स्त्रियाँ उन सम्पत्तिवान पुरुषों पर निर्भर होती चली गयीं.*

 

*दास प्रथा के दौर में औरतों को गुलाम बना कर उन्हें जानवरों की तरह खरीदा-बेचा जाने लगा.*

 

*सामंती दौर में शोषक वर्ग की कुछ औरतों को थोड़ी राहत मिली, मगर शोषित-पीड़ित वर्ग की महिलाओं को गुलामी से राहत नहीं मिली.*

 

*पूँजीवादी दौर में भी धनी वर्ग की थोड़ी सी महिलाओं को थोड़ी सी आजादी मिल पायी, मगर शोषित पीड़ित वर्ग की महिलाओं पर अत्याचार बढ़ता ही गया. वे आज भी घरेलू कामों से आजाद नहीं हो सकी हैं.*

 

*आज अर्धसामन्ती अर्धऔपनिवेशिक व्यवस्था के कारण, भारत में 95% महिलाएँ चौका-बर्तन, झाड़ू-पोंछा, बच्चों की परवरिश, घरेलू पशुपालन आदि में फँसी हुई हैं, जिससे उनका व्यक्तित्व विकास नहीं हो पा रहा है. यही उनकी गुलामी का मुख्य कारण है.*

 

*चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम जैसे लगभग एक दर्जन ऐसे देश हैं जहाँ समाजवादी व्यवस्था के तहत औरतों को सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगाया गया है. उनका घरेलू काम लगभग खत्म हो गया है. चीन में 97% घरों में चूल्हा नहीं जलता.*

 

*तो सवाल उठता है कि लोग खाते क्या हैं? तो आपको बता दें कि उनकी रुचि के अनुसार संतुलित आहार होटलों से आ जाता है.*

 

*तो फिर सवाल उठता है कि इतना पैसा कहाँ से आता है?*

 

*दरअसल चीन में औरत हो या मर्द, लगभग सबको सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार मिला हुआ है, सबको अच्छी तनख्वाह मिलती है.*

 

*चीन में घरों में पशु नहीं पालते. तो फिर दूध कहाँ से आता है?*

 

*बता दें कि चीन में हजारों ऐसे-ऐसे विशाल डेयरी उद्योग हैं जहाँ लाखों की तादात में पशु पाले जाते हैं. दूध दुहने से लेकर पशुओं को चारा खिलाने, पिलाने, सफाई.. आदि काम मशीनों से होता है. इन्हीं डेयरी उद्योगों से पर्याप्त मात्रा में दूध व मांस जनता के लिए सस्ते में उपलब्ध हो जाता है. माताओं द्वारा बच्चों की परवरिश का घरेलू काम लगभग खत्म हो गया.*

 

*दरअसल बालविकास केन्द्रों/ शिशु केन्द्रों में एक्सपर्ट लोगों द्वारा सभी बच्चों की बेहतर देख-रेख होती है.*

 

*हास्टल युक्त स्कूलों-कालेजों में सभी बच्चों की बेहतर देखभाल के साथ ही उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा भी दी जाती है.*

 

*इस प्रकार महिलाओं के ऊपर घरेलू काम का बोझ लगभग खत्म हो गया है. महिलाएँ आजाद हो गयी हैं.*

 

*हमारे देश में आज भी सबसे ज्यादा पूजापाठ महिलाएँ ही कर रही हैं, मगर सबसे ज्यादा महिलाएँ ही सतायी जा रही हैं. अत: पूजापाठ से महिलाओं को आजादी नहीं मिल सकती.*

 

*जिस तरह ट्रैक्टर आ जाने से पुरुषों का हल चलाने वाला काम खत्म हो गया; वैसे ही पशुपालन, बच्चों की परवरिश, भोजन पकाने आदि कामों में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होगा, तभी महिलाओं को अपने व्यक्तित्व विकास का मौका मिलेगा.*

 

*तब औरतें घरेलू काम से आजाद होकर सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकेंगी.*

 

*भारत में 99% महिलाएं गुलाम हैं. वे घरेलू कामों में फँसी हुई हैं. इस वजह से उनका व्यक्तित्व विकास नहीं हो पा रहा है.*

 

*जब तक समाजवादी व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक सभी महिलाओं को न तो सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगाया जा सकेगा, न ही उन्हें घरेलू कार्यों से निजात मिलेगी.*

 

*एंगेल्स ने महिलाओं के उत्पादन की प्रक्रिया से दूर होने और घरेलू श्रम के दायरे में सीमित हो जाने को उनके कमज़ोर पड़ने का महत्वपूर्ण कारण माना है.*

 

*यही वजह है कि एंगेल्स ने घोषणा के स्वर में कहा कि “जब तक महिलाओं को सामाजिक उत्पादन के काम से अलग और केवल घर के काम-काज तक ही सीमित रखा जाएगा, तब तक महिलाओं का स्वतंत्रता प्राप्त करना और पुरुषों के समान अधिकार पाना असंभव है और असंभव ही बना रहेगा.”*

 

*पूँजीवादी विकास में थोड़ी सी महिलाएं ही सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगाई जा सकती हैं. इसलिए पूँजीवादी व्यवस्था में थोड़ी सी महिलाओं को थोड़ी सी ही- आजादी मिल सकती है.*

 

*यदि यह व्यवस्था भारत की तरह अर्धसामन्ती-अर्धऔपनिवेशिक है तो इसमें बहुत कम महिलाओं को बहुत थोड़ी सी आजादी मिल सकती है.*

 

*समाजवादी अर्थव्यवस्था ही सभी महिलाओं को उनकी योग्यतानुसार सामाजिक उत्पादन के कार्यों में लगा सकती है.*

 

*अत: एँगेल्स का यह सपना सिर्फ और सिर्फ समाजवादी व्यवस्था में ही पूरा हो सकता है. समाजवादी व्यवस्था में जब आधुनिक मशीनों के जरिए बड़े पैमाने पर भोजन बनेगा तो भोजन बनाने का घरेलू काम खत्म हो जाएगा, आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के द्वारा आवासीय विद्यालयों में बच्चों की देख-भाल होगी, तो बच्चों की देखभाल का घरेलू काम ही खत्म हो जायेगा. बड़े पैमाने पर पशुपालन होगा और पशुपालन का औद्योगीकरण होगा, तब पशुपालन घरेलू काम नहीं रह जाएगा, इसी तरह सारे घरेलू काम जब बड़ी मशीनों के जरिए बड़े पैमाने पर होने लगेंगे तो घरेलू काम रह ही नहीं जाएगा.*

 

*इस तरह महिलाओं को घरेलू काम से आजादी मिल जाएगी.*

 

*आधुनिक समाजवादी उद्योगों में महिलाएं भी पुरुषों के बराबर काम करेंगी तभी महिलाएँ आजाद हो पायेंगी.*

 

*आप देख सकते हैं कि जिन देशों में समाजवादी तरीके का उत्पादन और वितरण व्यवस्था मौजूद है, उन देशों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार है.*

 

*भारत में किसानों की आजादी के रास्ते ही समाजवाद आ सकता है. अतः महिलाओं को कृषि क्रांति के लिए संगठित होकर संघर्ष करना पड़ेगा…*

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