*||जेलतंत्र की ओर बढ़ता लोकतंत्र: सत्ता का भय और गिरफ़्तारी की राजनीति||*
|
😊 Please Share This News 😊
|
✍️ *_मोहम्मद उवैस रहमानी_ जी*
भारत में आज़ादी से लेकर अब तक लोकतंत्र की पहचान रही है – बहस, असहमति और विचारों की स्वतंत्रता। मगर हाल के वर्षों में जिस तरह से मामूली बयानों पर एफआईआर,गिरफ़्तारी और आरोपों की बौछार हो रही है, वह इस लोकतांत्रिक चरित्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब सत्ता के पास एक ऐसा वर्ग दिखाई दे रहा है, जो न तर्क से जवाब देता है, न विरोध को सहन करता है। उसके पास एकमात्र रास्ता बचता है – गिरफ़्तारी करवा देना।
*हिमांशी नरवाल से लेकर* विदेश सचिव विक्रम मिसरी की बेटी तक, सत्ता के आलोचकों पर खुलकर कीचड़ उछाला गया, मगर कार्रवाई किसी पर नहीं हुई। लेकिन जैसे ही कोई आम नागरिक या पत्रकार कुछ लिख दे जो सत्ता के पक्ष में न हो, आरोपों की बाढ़ आ जाती है – “सेना का अपमान”देशद्रोह”आस्था पर हमला”जैसे जुमले बना दिए जाते हैं और गिरफ़्तारी हो जाती है।
*मध्यप्रदेश के मंत्री कुँवर विजय शाह* का हालिया बयान इसका उदाहरण है, जहाँ उन्होंने कर्नल सोफ़िया कुरैशी को निशाना बनाते हुए न सिर्फ़ एक सैन्य अधिकारी का अपमान किया, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय को कटघरे में खड़ा कर दिया। मगर अब तक उनके ख़िलाफ़ कोई पुलिसिया कार्रवाई नहीं हुई।
*यह दोहरा मापदंड बताता है* कि कानून अब निष्पक्ष नहीं रहा, बल्कि सत्ता का उपकरण बनता जा रहा है। आलोचना और असहमति को दबाने के लिए केस दर्ज करना, जेल में डाल देना – यह “लोकतंत्र” नहीं, “जेलतंत्र” का संकेत है।
*मीडिया का कर्तव्य* बनता है कि ऐसे मामलों पर सवाल पूछे, विपक्ष ज़िम्मेदारी से सरकार को घेरें और समाज एकजुट होकर लोकतंत्र को बचाए। क्योंकि अगर असहमति को अपराध बना दिया गया, तो कल आपकी चुप्पी भी आपको नहीं बचा पाएगी।
*मोहम्मद उवैस रहमानी*
*प्रधान संपादक*
RH NEWS 24&अख़बार रुखसार ए हिन्द
|
व्हाट्सप्प आइकान को दबा कर इस खबर को शेयर जरूर करें |

