चारों तरफ़ सफ़ेद चादरों में लिपटे लोग, सब कुछ अल्लाह की हिकमत से है। सुब्हान अल्लाह !
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मुज़दलफ़ा में रात ऐसे गुज़ारी जाती है,
ना कोई महलात, ना आलीशान इमारतें, ना नरम बिस्तर, ना क़ीमती कंबल। यह एक ऐसी रात होती है जहाँ अमीर और ग़रीब सब बराबर हो जाते हैं। ज़मीन बिछौना बन जाती है, और ऊपर अल्लाह की रहमत साया करती है।
तकिया तुम्हारा अपना बाज़ू होता है।
यह नींद दुनिया की किसी नींद जैसी नहीं होती, थकावट से गहरी नींद आती है।
चारों तरफ़ सफ़ेद चादरों में लिपटे लोग, सब कुछ अल्लाह की हिकमत से है। सुब्हान अल्लाह !
नींद से उठते हो ख़ुशी से भरे हुए, जमरात के लिए कंकड़ियाँ चुनते हो,
और फ़ज्र की नमाज़ के बाद मिना की तरफ़ रवाना हो जाते ह💐!
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