कोलंबिया की वो गरज जिसने संयुक्त राष्ट्र को हिला दिया, गुस्तावो पेत्रो ने सेनाओं को एकजुट कर फ़लस्तीन की आज़ादी का आह्वान किया और इसी के साथ अरबों की ख़ामोशी को बेनक़ाब कर डाला।ikbal usmani
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एक दुर्लभ और ऐतिहासिक राजनीतिक पल में, कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर खड़े हुए, वो न तो कूटनीतिक लफ़्फ़ाज़ी करने आए थे, न ही ताक़तवरों की चापलूसी करने, वो आए थे दुनिया की सोई हुई ज़मीर को झकझोरने, और उनकी बातों ने वाक़ई बिजली बनकर असर किया।
पेत्रो ने अपनी गूंजती हुई पुकार लगाई, मैं दुनिया के देशों और क़ौमों से आह्वान करता हूँ कि अपनी फ़ौजें और हथियार एकजुट करें और फ़लस्तीन व इंसानियत को आज़ाद कराएँ”, चाहें बदले में आजादी मिले या फ़िर मौत।
ये शब्द सिर्फ़ गज़ा तक सीमित नहीं थे, बल्कि हर उस ताक़त और सत्ता तक पहुँचे जिन्होंने शर्मनाक चुप्पी साध रखी है या ख़तरनाक मिलीभगत में शामिल है।
उन्होंने गज़ा पर हो रहे नरसंहार को साधारण “बमबारी” कहने से इंकार कर दिया, उनके शब्दों ने हक़ीक़त उजागर की, और कहाँ ये पूरी इंसानियत के ख़िलाफ़ अपराध है।
इतना ही नहीं, पेत्रो ने खुले मंच पर अमेरिका की भूमिका को बेनक़ाब करते हुए कहा कि अमेरिका इस बर्बरता का सबसे बड़ा साझेदार और ज़िम्मेदार है।
और तो और, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से सीधे ऐलान किया कि डोनाल्ड ट्रंप को अंतरराष्ट्रीय अदालत में घसीटा जाना चाहिए, उन पर कैरेबियन में नागरिकों की हत्या और गज़ा की जंग में सीधा शामिल होने का इल्ज़ाम लगाया।
ये केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि ज़मीर की चीख़ थी एक नैतिक पुकार जिसने सन्नाटे के महलों को हिला दिया।
अब सवाल ये है कि, हम शांति की उम्मीद कैसे कर सकते हैं उनसे, जो युद्ध की आग को हथियार और पैसों से भड़काते हैं?
हम भरोसा कैसे कर सकते हैं उनकी मध्यस्थता पर, जो जल्लाद का हाथ थामकर “तटस्थता” का झूठा नारा लगाते हैं?
और हमारी इज़्ज़त कहाँ रह जाती है, जब हम अपने फ़ैसले उन ताक़तों के हवाले कर देते हैं जो हमें सिर्फ़ अपने हितों के औज़ार समझती हैं?
पेत्रो की आवाज़ केवल दुनिया के नेताओं के लिए नहीं थी, बल्कि अरबों की शर्मनाक चुप्पी पर भी एक करारा तमाचा थी, यह आवाज़ आज़ाद कौमों के लिए एक मशाल है, हर उस इंसान के लिए जो अब भी इंसानियत के नाम पर धड़कता है।
फ़लस्तीन सिर्फ़ ज़मीन या सरहदों का मसला नहीं है, बल्कि इंसानियत का सबसे बड़ा इम्तिहान है।
जो गज़ा की त्रासदी को नहीं समझता, उसे पहले अपनी इंसानियत पर सवाल उठाना चाहिए।
सलाम है राष्ट्रपति पेत्रो को, जिन्होंने वो सच बोला जिसे कहने की हिम्मत बहुतों में नहीं थी।
और सलाम है हर उस आज़ाद आवाज़ को, जो दुनिया की बेइमानी और ग़फ़लत के मलबे पर इंसानियत का झंडा ऊँचा उठाए हुए है।
Tosif Sherani ✍️
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