भोपाल.संसदीय लोकतंत्र की आत्मा ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ और ‘विधायी बहुमत’ के अटूट सिद्धांतों पर टिकी होती है. अकरम पटेल की विशेष ख़बर।
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भोपाल | दिनांक: 22 अप्रैल, 2026
बहुमत की (अ)नैतिकता और प्रोपोगेंडा का पर्दाफाश-
डॉ विक्रम चौधरी
भोपाल.संसदीय लोकतंत्र की आत्मा ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ और ‘विधायी बहुमत’ के अटूट सिद्धांतों पर टिकी होती है। लोकतंत्र में किसी भी सरकार का अस्तित्व केवल चुनावों में मिली जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक परीक्षण सदन के भीतर उस विश्वास और बहुमत में निहित है, जो जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संसदीय प्रणाली की मर्यादा यह मांग करती है कि विधायिका और कार्यपालिका के बीच का संतुलन सदैव बना रहे। जब कोई सरकार अपना अत्यंत महत्वपूर्ण और नीतिगत विधेयक सदन के पटल पर पारित कराने में विफल रहती है, तो यह केवल एक विधायी हार नहीं होती, बल्कि शासन करने के उसके नैतिक अधिकार पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा देती है।
सदन में हालिया घटनाक्रम ने सरकार के उस प्रोपोगेंडा को पूरी तरह उजागर कर दिया है, जिसमें ‘महिला आरक्षण’ के नाम पर असल में एक ‘परिसीमन बिल’ थोपने की कोशिश की जा रही थी। इंडिया ब्लॉक ने सजगता दिखाते हुए इस बिल के उस खतरनाक पहलू को विफल कर दिया है, जो आरक्षण की आड़ में देश की अखंडता को उत्तर और दक्षिण के बीच विभाजित करने की एक सोची-समझी मुहिम थी। इस हार के बाद अब सरकार की नैतिक पराजय सार्वजनिक हो चुकी है। संवैधानिक परंपराएं और ‘वेस्टमिंस्टर प्रणाली’ की स्वस्थ विरासत हमें सिखाती है कि जब सरकार अपनी नीतियों के प्रति सदन का विश्वास खो दे, तो पद पर बने रहने का मोह त्याग देना ही लोकतांत्रिक शुचिता का प्रतीक है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से डॉ. विक्रम चौधरी यह स्पष्ट करते हैं कि आज प्रश्न किसी व्यक्ति के पद का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा का है। इस्तीफा देना किसी कमजोरी का परिचायक नहीं, बल्कि उस ‘पवित्र मर्यादा’ की रक्षा है जो लोकतंत्र को भीड़तंत्र से अलग करती है। जब सरकार अल्पमत में होकर भी सत्ता से चिपकी रहती है, तो वह एक ‘विधायी गतिरोध’ पैदा करती है, जिससे संवैधानिक ढांचे को अपूरणीय क्षति पहुँचती है। शासन को चलाने के लिए केवल संख्याबल पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिक बल का होना अनिवार्य है।
अतः, वर्तमान सरकार को अपनी नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने के लिहाज से स्वयं आगे आकर इस्तीफा देना चाहिए। यह कदम इसलिए आवश्यक है ताकि सरकार रहे न रहे, पर हमारा लोकतंत्र और उसकी सदियों पुरानी मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे। एक जीवंत लोकतंत्र में हार को गरिमापूर्ण तरीके से स्वीकार करना ही वह स्वस्थ परंपरा है जो शासन को जवाबदेह और पारदर्शी बनाती है। भारत की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए इंडिया ब्लॉक सदैव प्रतिबद्ध है और संसदीय गरिमा को बहाल करना ही आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।
डॉ. विक्रम चौधरी
प्रवक्ता, मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी
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