भारत में कुछ शहरों में अख़बार छपता बाद में हे लेकीन बिक पहले जाता हे सूत्रों से
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हम वो कलम नहीं जो बिक जाती है दरबारों में
हम शब्दों की दीपशिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं
कविवर हरिओम पंवार की ये क्रांतिकारी पंक्तियां इस लिए दोहरा रहा हूं कि इन दिनों राजसत्ता देश के उन तमाम कलमकारों को भयाक्रांत करना चाहती है जो उसे आईना दिखाने का साहस जुटा रहे हैं। लेकिन शायद वे भूल रहे हैं कि इस देश ने इससे से कहीं ज्यादा भयावह दिन देखें हैं, तब भी कुछ राष्ट्रभक्त ऐसे थे फना तो हो गए लेकिन न झुके न रुके। जयहिंद
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