9अगस्त सालाना उर्स पर विशेष” जबलपुर की शान हैं वली ए कामिल हज़रत मशीन वाले बाबा साहब* *तालिब हुसैन,पत्रकार*
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” हज़रत मशीन वाले बाबा साहब सदी के उन नायाब वलियों में शामिल हैं, जिन्हें देखने के बाद कोई भी यह कह सकता था कि इसे कहते हैं अल्लाह का दोस्त. बाबा हुज़ूर के पास धन दौलत शौहरत की कमी नहीं थी, लेकिन तकवा, परहेज़गारी, ख़ाकसारी और ख़ौफ़ ए ख़ुदा ने आपको दुनिया से बेपरवाह कर दिया था.”
सरज़मीने जबलपुर में सदियों से पीर फ़कीरों, साधु संतों, वलियों, बुज़ुर्गों ने दुनिया को प्यार, मुहब्बत; दया, करूणा, प्रेम
भाईचारे व मानवता का पैगाम दिया है. इन्हीं बेमिसाल हस्तियों में से एक हैं जिंदा ए जावेद, सदरूल आलम, रहबरे शरियत, वली ए कामिल, शाह अलमारूफ़
अल्हाज हज़रत बाबा सआदत हुसैन नक्शबंदी नज्मी रियादी रहमातुल्लाह अलैहे हज़रत मशीन वाले बाबा साहब. जिनकी ख़ाकसारी देखते ही बनती थी. मौजूदा भौतिकवादी युग में जब
बड़े बड़े साधु संत वैभव, धन, दौलत, शौहरत व प्रचार प्रसार के माया जाल से खुद को बचा नहीं पाते हैं, ऐसे दौर में बाबा हुज़ूर ने सुख साधन, दौलत, वैभव से नाता तोड़कर अपने माबूद से ऐसी लौ लगाई कि दुनिया के हर ऐशो आराम को ठुकरा दिया. काली चाय पीकर शुक्र ए ख़ुदा करना , जमीन पर बोरा बिछाकर बैठना, और पब्लिकसिटी से कोसों दूर रहने वाले बाबा साहब
कई मायनों में बेमिसाल हैं. आपके पास दुनिया की नियामतों का अम्बार था, मख़लूके ख़ुदा पर आप दिल खोलकर खर्च किया करते थे, लेकिन खुद सूफ़ियाना जिंदगी गुज़ार कर दुनिया को यह बता दिया कि “अल्लाह वाले”
किसी चकाचौंध की परवाह नहीं करते. आज के दौर में किसी बुजुर्ग की एक दो करामात देखकर लोग उनके दीवाने हो जाते हैं, लेकिन आपकी तो सारी जिंदगी ही करामत थी. ना जाने ऐसे कितने मरीज़ होंगे जो बीमारी से निराश होकर जिंदगी को बोझ समझ बैठे थे, जिनके उपचार के लिए डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, ऐसे बेबस लोगों को अल्लाह ने आपके माध्यम से जीवनदान दिया. करीब पांच दशकों तक पीड़ित मानवता की सेवा करने वाले बाबा साहब ने जाति धर्म से परे मख़लूके ख़ुदा की जो सेवा की है, उसे लिखने बताने में महीनों लग जायेंगे. शायद आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हज़रत ने कभी किसी स्कूल या मदरसे में कोई पढ़ाई नहीं की, लेकिन अल्लाह की ऐसी अता थी कि हर सब्जेक्ट पर किसी भी एक्सपर्ट से डिबेट करने लगते. बाबा साहब के आस्ताने में हमेशा से हर मजहब के लोगों की आवाजाही रहती है. जो आज भी बनी हुई है.
आपका उठना बैठना चलना फिरना सब कुछ रहस्य था, करामतों पर करामत दिखाने के बावजूद खुद को हमेशा पर्दे में रखा. 22 मई 1997 को जबलपुर में आए विनाशकारी भूकम्प को याद कर आज भी लोग दहल जाते हैं. चश्मदीद बताते हैं कि जिस वक्त अल सुबह धरती डोल रही थी तब घण्टाघर स्थित अपने आस्ताने के बाहर बाबा हुज़ूर घुटनों के बल बैठकर ताकत के साथ इस मुद्रा में थे मानो ज़मीन को कंपन करने से रोक रहे हों, हकीकत क्या है यह तो अल्लाह जाने, लेकिन यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी कि मशीन वाले बाबा साहब की करामत से जबलपुर भारी तबाही से बच गया. कहते हैं कि इस राज़ के फ़ाश होने से बाबा हुज़ूर ग़मगीन रहने लगे, क्योंकि ना तो उन्हें लोकप्रियता पसंद थी और ना ही तारीफ़ें सुनना उनकी आदत थी. इसके बाद आपकी सेहत गिरने लगी और खुद आपने यह फ़रमा दिया कि फ़लां दिन आप इस दुनिया को अलविदा कह देंगे. हुआ भी वही बतायी गयी तारीख़ यानि तीन सफ़र 9 जून 1997 को आप इस दुनिया से नाता तोड़कर अपने माबूद ए हकीकी से जा मिले. बाबा साहब भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके चाहने और मानने वाले आज भी
उन्हें अपने बीच मेहसूस करते हैं.
बेशक अल्लाह के वली ज़िंदा रहते हैं. आप तो जिंदा ए जावेद हैं. आज भी आपके आस्ताने से लोगों को फ़ैज़ हासिल हो रहा है और इंशाअल्लाह कयामत तक जारी रहेगा.आमीन.
( लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी दिल्ली के पूर्व छात्र हैं).
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