सकारात्मकता का सारथी सम्मान का अभिलाषी नहीं होता है।उसका कर्मयोग ही उसे सम्मान के शिखर पर आरोहित कर देता है।
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” सकारात्मक चिंतन “
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आत्म अवलोकनार्थ।
सम्मानीय आत्मजन,
शुभ दिवस ।
“अमृत कलश “
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(1)यदि हम एकात्म मानवता वाद,वसुधैव कुटुंबकम व सह-अस्तित्व के यथार्थ मे विश्वास करते हैं,तो हम अपने पड़ोसी से किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर घृणा,वैमनस्यता व अमानवीयता का कार्य,व्यवहार व आचरण नहीं कर सकते हैं।
(2)सदभावना ही सकारात्मक चिंतन व चरित्र का आधार है।अद्यतन काल मे सदभावना की अभिव्यक्ति मे भी बौद्धिक स्तर पर सतर्कता व सावधानी आवश्यक है।
(3)मनुष्य जीवन में व्यक्तिगत,पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर लौकिक व पारलौकिक सार्थक सफलता मन के सकारात्मक अंकुरण,पल्लवन व उन्नयन पर निर्भर होकर इसे नकारात्मक दुष्प्रवृतियों के प्रलोभनों से सुरक्षित करना प्रथम प्राथमिकता होना चाहिए।
(4)मन,वचन व कर्म मे सदभावना,सकारात्मकता व मानवीयता के अभाव में न्यायिक अभिव्यक्ति असंभव है।
(5)सकारात्मकता का सारथी सम्मान का अभिलाषी नहीं होता है।उसका कर्मयोग ही उसे सम्मान के शिखर पर आरोहित कर देता है।
ऋग “भारती “
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Regards:Iqbal Khan Gauri,Retired District Judge,M.P.
Now:Law adviser & Human duties Activist,Ujjain.
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