ज्ञान, संस्कृति और भविष्य से जुड़ाव का पर्व “बसंत आया तो चेतना ने भी ओढ़ा उजास, पीली धूप में जागा ज्ञान का विश्वास। तकनीक हो पथ, पर संस्कृति रहे सार, सरस्वती के संग बढ़े भविष्य का विस्तार।” रीपोर्ट मनोहर मालवीय
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प्रीतमनगर,शासकीय हाई स्कूल
दंतोड़िया में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर ज्ञान, संस्कृति और प्रकृति के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य ऋतेश पंवार ने बसंत पंचमी के साहित्यिक, वैदिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक महत्व के बारे में जानकारी साझा करते हुए इस पर्व की बधाई दी।
वरिष्ठ शिक्षक वीरेंद्र कुमार कैथवास ने अपने उद्बोधन में कहा कि बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन के साथ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और नवचेतना के संचार का प्रतीक है। शीत ऋतु के पश्चात बसंत का आगमन प्रकृति को नवजीवन प्रदान करता है—पेड़ों पर नई कोपलें, खेतों में सरसों की पीली आभा और वातावरण में उल्लास दिखाई देता है। इसका प्रभाव मानव मन और शरीर पर भी पड़ता है, जिससे सृजनशीलता, एकाग्रता और सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है।
उन्होंने बताया कि वैदिक परंपरा में बसंत ऋतु को ऋतु-राज कहा गया है और बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की आराधना की जाती है, जो विद्या, बुद्धि, वाणी और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह पर्व विद्यार्थियों को अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। पीला रंग प्रकाश, ऊर्जा और बौद्धिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।
कार्यक्रम के दौरान पंवार ने बसंत पंचमी के साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक भारतीय साहित्य, संगीत और लोक परंपराओं में बसंत का विशेष स्थान रहा है। कवियों ने इसे प्रेम, सौंदर्य और उल्लास की ऋतु के रूप में चित्रित किया है, वहीं लोक जीवन में यह उत्सव और उमंग का कारण बनी है।
शैक्षणिक महत्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी विद्यार्थियों के लिए विद्यारंभ, नवसंकल्प और बौद्धिक विकास का संदेश देती है। यह पर्व यह सिखाता है कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कार, अनुशासन और रचनात्मक सोच का विकास भी है।
शिक्षिका सीमा खरे ने भविष्य के संदर्भ में उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि आज के डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में भी बसंत पंचमी जैसे सांस्कृतिक पर्वों का महत्व कम नहीं होगा। तकनीक ज्ञान का माध्यम हो सकती है, लेकिन संवेदना, संस्कृति और मूल्य मानव समाज की आत्मा हैं। आने वाले समय में AI इन परंपराओं के संरक्षण और प्रचार का साधन बन सकता है, किंतु उनके मूल भाव को समाप्त नहीं कर सकता।
शिक्षक गोपाल शर्मा ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ते हुए आधुनिक ज्ञान और तकनीक का सकारात्मक उपयोग करें। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों में न केवल पर्व के प्रति समझ विकसित हुई, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और भविष्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी।
इस अवसर पर सीमा खरे, वीरेंद्र कुमार कैथवास, ईश्वरलाल मालवीय, कालू सिंह चौहान, बद्रीलाल परमार, कोमल परमार, गोपाल भाभर, राजेश मालीवाड़ सहित विद्यालयीन छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
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