सिद्धांत सेवा और साहस का नाम है दिग्विजय सिंह* जन्मदिन विशेष:28 फरवरी.   *तालिब हुसैन। – किस्मत न्यूज

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सिद्धांत सेवा और साहस का नाम है दिग्विजय सिंह* जन्मदिन विशेष:28 फरवरी.   *तालिब हुसैन।

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नज़र में सच्चाई, इरादों में उजाला रखते हैं,

हर दौर में हक़ की बात कहने का हौसला रखते हैं,

सियासत में भी उसूलों की मशाल जलाए रखते हैं,

दिग्विजय सिंह अपने वजूद में भरोसे का काफ़िला रखते हैं.

      भारतीय राजनीति के मौजूदा दौर में, जब वैचारिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक विमर्श अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, ऐसे समय में दिग्विजय सिंह का व्यक्तित्व अलग पहचान रखता है. वे उन नेताओं में हैं जिन्होंने नफा-नुकसान की राजनीति से ऊपर उठकर देश की एकता, अखण्डता और पारस्परिक सद्भाव को अपनी प्राथमिकता बनाया.वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जनसेवा को जीवन का ध्येय मानने वाले कर्मयोगी हैं.

सेवा और संवेदनशीलता की मिसाल 22 मई 1997 को देखने मिली. जब जबलपुर में आए विनाशकारी भूकंप ने सैकड़ों परिवारों को प्रभावित किया. उस कठिन समय में मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह ने प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना स्वयं प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया. जेडीए के तत्कालीन उपाध्यक्ष (उपमंत्री दर्जा प्राप्त) कदीर सोनी के साथ निजी वाहन से वे उन क्षतिग्रस्त मकानों तक पहुँचे जो कभी भी गिर सकते थे.उन्होंने जोखिम उठाकर हालात का जायज़ा लिया और पीड़ितों को मुआवज़ा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. करीब तीन दशक बाद भी लाखों लोग उनकी उस निडरता और संवेदनशीलता को याद करते हैं. *विरासत से नेतृत्व तक का सफर-* 28 फरवरी 1947 को राघौगढ़ के पूर्व शासक परिवार में जन्मे दिग्विजय सिंह के पिता बलभद्र सिंह गुना जिले के राघौगढ़ के राजा थे. इंदौर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन को चुना.

उनका नाम ही उनके व्यक्तित्व का परिचायक है— दिग्विजय, अर्थात सभी दिशाओं में विजय प्राप्त करने वाला. राजनीति की लंबी पारी में उन्होंने इस अर्थ को सार्थक भी किया.

 *जन नेता जो रिश्ते निभाना जानते हैं*- छात्र राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक, दिग्विजय सिंह ने रिश्तों को सहेजने की परंपरा निभाई. उनसे जुड़े हजारों लोग आज भी उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हैं. हजारों की भीड़ में भी वे अपने कार्यकर्ताओं को पहचान लेते हैं. अक्सर भीड़ में कंधे पर हाथ रखकर सहज भाव से संवाद करना उनकी खास पहचान रही है.पंचायती राज से विकास की नई धारा दिखाने वाले दिग्विजय सिंह दस सालों तकमध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं. उनके आलोचक भी यह स्वीकार करते हैं कि प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत आधार देने का श्रेय उन्हें जाता है.1993 में उनके नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी और 1998 में पुनः सत्ता में वापसी हुई. संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका और रणनीतिक कौशल ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया.

 *संघर्ष और निष्ठा का प्रतीक-* 1971 से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय दिग्विजय सिंह 1977 में पहली बार विधायक बने. 1980-84 के दौरान वे मंत्रीमंडल में रहे, 1984 और 1991 में लोकसभा सांसद चुने गए और वर्तमान में राज्यसभा में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं.

संकट के हर दौर में उन्होंने पार्टी के साथ खड़े रहने का उदाहरण प्रस्तुत किया. 2018 में मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन में भी उनकी अहम भूमिका रही.

3,300 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा के माध्यम से उन्होंने गांव-गांव संवाद स्थापित किया. यह यात्रा आध्यात्मिक होते हुए भी जनसंपर्क का सशक्त माध्यम बनी.

 *सिद्धांतों पर अडिग व्यक्तित्व-* दिग्विजय सिंह को करीब से जानने वाले कहते हैं कि राजनीति में रहते हुए भी वे छल, कपट और फरेब से दूर रहते हैं.जो कहते हैं, उसे निभाते हैं और जो संभव नहीं, उसे स्पष्ट शब्दों में मना कर देते हैं.

उनकी यही स्पष्टवादिता, साहस और संवेदनशीलता उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है.

 *समर्पण को सलाम-* सियासत के इस लंबे सफर में उन्होंने यह साबित किया है कि नेतृत्व केवल पद से नहीं, बल्कि सिद्धांतों से बड़ा होता है.

न्मदिन के इस अवसर पर उनके स्वस्थ, दीर्घ और सक्रिय जीवन की दुआ करते हैं-

जो सच की राह पर चलकर भी मुस्कुराते हैं,

वही इतिहास के पन्नों में अमर हो जाते हैं.

सियासत में किरदार जिनका साफ़ आईना हो,

ऐसे नेता सदियों तक याद किए जाते हैं.

(लेखक जबलपुर के फाउंडर टीवी जर्नलिस्टस हैं)

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