बड़ा मासूम सा दिल है , बहुत ही साफ़ नीयत भी । हमारी सोच में तुमको सियासत मिल नहीं सकती ।कमलेश श्रीवास्तव । सर्वाधिकार सुरक्षित
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एक ग़ज़ल … मेरे ताज़ा ग़ज़ल संग्रह ” क्या मुश्किल है ” से ….
मुक़द्दर में नहीं तेरे, ये दौलत मिल नहीं सकती।
भले कितना तड़प ले तू, मुहब्बत मिल नहीं सकती ।
हमें हर साँस लेने की बड़ी क़ीमत चुकानी है ।
किसी से भी करो मिन्नत , रियायत मिल नहीं सकती ।
कहीं बचपन में खो दी थी , वो जन्नत मुस्कुराहट की ।
भले अब उम्र भर रो लें ,वो जन्नत मिल नहीं सकती ।
हमारी दुश्मनी दिल से , हमें यूँ ही तड़पना है ।
हमें पुर अम्न आँचल की हिफाज़त मिल नहीं सकती ।
बड़ा मासूम सा दिल है , बहुत ही साफ़ नीयत भी ।
हमारी सोच में तुमको सियासत मिल नहीं सकती ।
ग़ज़ल तुम ठीक कहते हो , औ लहज़ा भी मुनासिब है ।
मगर कुछ है कमी तुममे कि शोहरत मिल नहीं सकती ।
अभी कुछ उम्र बाक़ी है , अभी है साँस का पहरा ।
अभी ”कमलेश” तुमको भी ज़मानत मिल नहीं सकती ।
कमलेश श्रीवास्तव ।
सर्वाधिकार सुरक्षित ।
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