मनत्व अर्थात मानसिक चरित्र। सामान्यतः मनुष्य का ज्ञानवान अस्तित्व मानसिक प्रतिभा,क्षमता व योग्यता पर ही निर्भर है।मनुष्य की प्रकृति,प्रवृत्ति,शिक्षण,
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” सकारात्मक चिंतन “😞😞😞😞😞 आत्म अवलोकनार्थ। सम्मानीय आत्मजन, शुभ दिवस।“मनुष्य का मनत्व “प्रशिक्षण व परिस्थितियां ही उसके विचार,कार्य,व्यवहार व आचरण का निर्माण करतें है।अन्य शब्दों में,प्रत्येक मनुष्य उसकी मानसिक संस्कार धर्मिता (psychic conditioning) की परिणति होकर उसकी वैचारिक व भावात्मक अभिव्यक्तियाॅ, प्रतिक्रियाएं व संवेदनाएं उसकी मानसिक संस्कार धर्मिता से शत प्रतिशत प्रभावित होकर एकपक्षीय,द्विपक्षीय व निष्पक्ष होती हैं। आरोप-प्रत्यारोप का संव्यवहार भी इसी मानसिक संस्कार धर्मिता से प्रभावित होता है। मानसिक संस्कार धर्मिता की प्रक्रिया में प्रत्येक मनुष्य के पंथगत धर्म,जाति,सम्प्रदाय व वर्ग की शिक्षाओं,मान्यताओं,
परम्पराओं व ईश्वरिय आस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होकर उसके मनोविज्ञान का निर्माण करतें हैं ।
प्रज्ञावान मनुष्य अपने मनोविज्ञान के यथार्थ को भलीभांति समझकर
वैचारिक व भावात्मक अभिव्यक्तियों,
संवेदनाओं व क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं का सकारात्मकता से संचालन कर अपने जीवन में सार्थक लौकिक व पारलौकिक सफलता को प्राप्त कर व्यक्तिगत,पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर सर्वे भवन्तु सुखीनः के मानवीय मूल्य को
आत्मसात कर मनुष्य इतिहास मे अमरता को प्राप्त करता है।
अवचेतन “भारती “
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Regards:Iqbal Khan Gauri,Retired District Judge,M.P.
Now:Law adviser & Human duties Activist,Ujjain.
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