*बिग ब्रेकिंग* ************* *बैतूल कलेक्टर अमनबीर सिंह बैंस का गुना तबादला..नरेन्द्र सूर्यवंशी होंगे बैतूल के नए कलेक्टर….!!* – किस्मत न्यूज

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*बिग ब्रेकिंग* ************* *बैतूल कलेक्टर अमनबीर सिंह बैंस का गुना तबादला..नरेन्द्र सूर्यवंशी होंगे बैतूल के नए कलेक्टर….!!*

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*मजदूर से कलेक्टर बनने तक का सफर : नरेन्द्र सूर्यवंशी*

 

एक सामान्य स्टूडेंट, जो ग्रेजुएशन तक कभी फर्स्ट डिविजन नहीं रहा। सरकारी स्कूल में ही पढ़ाई की। आर्थिक मजबूरियों के चलते जब पीएससी (लोक सेवा आयोग) में दिहाड़ी के तौर पर कार्य किया… सुबह 7 से लेकर रात के 10 बजे तक प्राप्त आवेदनों और उनकी प्रक्रियाओं से रू-ब-रू होते सोचा कि मैं खुद अफसर ही बन जाता हूं। एक जिद और जुनून से उसके अगले ही वर्ष सामान्य स्टूडेंट ने पोस्ट ग्रेजुएशन में कॉलेज की मेरिट में स्थान बना डाला। पीएससी में पहली परीक्षा में ही चयनित। पहली नौकरी ग्राम पंचायत में लगी तो ज्वाइन नहीं की फिर फूड इंस्पेक्टर, नायब तहसीलदार, मंडी सचिव, डिप्टी कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ, निगम कमिश्नर से लेकर विभिन्न मुकाम के बाद रतलाम कलेक्टर हैं नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी।

 

10 रुपए में 14 घंटे काम, रात को पढ़ाई

 

घर की आर्थिक मजबूरियों को देखते हुए सूर्यवंशी ने पीएससी में दिहाड़ी में कार्य शुरू किया, माह में 300 रुपए मिलते थे। सुबह सात बजे घर से नाश्ता कर निकलते और रात नौ बजे तक लौटते, बिना कुछ खाए 14 घंटे काम। रात को फिर पढ़ाई में जुटते। इंदौर के मच्छी बाजार में तब पढ़ाई का इतना माहौल भी नहीं था, लेकिन कुछ करने के जुनून से जीवन में सफलता का स्वाद चखा। यही कारण है कि जरुरतमंद विद्यार्थी दिखता है तो सूर्यवंशी उसकी मदद को आगे बढ़ते हैं।

 

बनना था डॉक्टर, बन गए अफसर

 

सूर्यवंशी असल में चिकित्सक बनना चाहते थे, बीएससी से ग्रेजुएशन किया। पीएमटी एग्जाम दिया लेकिन सफलता नहीं मिली। फिर लक्ष्य की दिशा बदली और राजनीतिक विज्ञान में पीजी कर कॉलेज की मेरिट में रहे।

 

पिता से सीखी हिम्मत-खुद्दारी-अनुशासन

 

कलेक्टर सूर्यवंशी की सफलता में उनके पिता बजरंग सूर्यवंशी का बड़ा योगदान रहा है। पिता सरकारी बाबू थे और उप सचिव से सेवानिवृत्त हुए। पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी को संभालने में उन्हें आर्थिक परेशानी का पग-पग पर सामना करना पड़ा लेकिन खुद की तनख्वाह के अलावा बच्चों से एक रुपया तक नहीं लिया। इनके पिता की खुद्दारी का आलम यह रहा कि वर्ष 2005 जुलाई की आखिरी तनख्वाह में से 10 हजार रुपए इनकी मां को यह कहते हुए दिए कि आखिरी समय में जलाने को लकड़ी भी इन पैसों से ही खरीदना। वर्ष 2021 में पिता के निधन पर 17 साल बाद इनकी मां ने वे दस हजार रुपए अलमारी से निकालकर हाथ में रखे तो काफी देर तक न कुछ बोल पाए और ना ही समझ पाए। जब सूर्यवंशी डिप्टी कलेक्टर बन गए, तब तक पिता नाराज होने पर पीट देते थे। अनुशासन इतना कि शाम छह बजे घर आना है तो पांच मिनट भी ऊपर नहीं हो सकती। इसी का परिणाम है कि सूर्यवंशी अपने कार्य में कभी घंटे नहीं गिनते हैं।

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